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एक कमजोर रक्षा बजट का प्रभाव

रक्षा बजट

सैन्य शक्ति अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में किसी देश की स्थिति निर्धारित करती है। एक मजबूत सेना का हमेशा ही सम्मान किया जाता है और दूसरे देश उसके साथ अपने रिश्ते बेहतर रखना चाहते हैं। ताकत के दूसरे तत्व,  आर्थिक और राजनैतिक तभी प्रभावी हो पाते हैं जब उनके पीछे एक ठोस सैन्य शक्ति खड़ी हो। वैसे सभी देशों, जिनकी अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में मजबूत स्थिति है,  के पास ताकतवर सेनाएं हैं। एक कमजोर सेना कभी भी किसी देश के संस्थानों एवं उसके लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हो पाएगी।





दक्षिण एशिया में, भारतीय संस्थान सुरक्षित हैं जिसकी वजह से दुनिया के दूसरे देश भारत में निवेश करने, उसकी सैन्य शक्ति के साथ साझीदारी करने के इच्छुक हैं और हमारा देश लगातार अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाता रहता है। इस क्षेत्र के दूसरे देशों के पास इस स्तर की संस्थागत सुरक्षा नहीं है और यही वजह है कि वे विकास के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं और उन्होंने भारत की तरह आर्थिक सफलता हासिल नहीं की है।

जैसे-जैसे भारत आर्थिक सफलता की राह पर आगे बढ़ता जाएगा, उसे अपने प्रतिस्पर्धी देशों, खासकर, इस क्षेत्र में चीन से चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए, चीन का दबाव लगातार बढ़ता जाएगा। वह भारत के इर्द-गिर्द कई स्थानों पर सैन्य आधारों का निर्माण कर रहा है, जिससे वह भारत को चारों तरफ से पूरी तरह घेर सके। गतिरोधों में बढ़ोतरी हो रही है और चीन आसियान (ASEAN) देशों के साथ भारत की निकटता तथा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ (Quad के साथ) उसकी सहभागिता को एक खतरे के रूप में देखेगा। दुनिया भर के कई देश उम्मीद करते हैं कि भारत को चीन के लिए संतुलनकारी ताकत साबित होना चाहिए, और यही वजह है कि ट्रम्प ने भी इस क्षेत्र को भारत-प्रशांत क्षेत्र करार दिया।

पाकिस्तान आंतरिक रूप से लगातार अस्थिर बना हुआ है। सेना के पास बातचीत करने एवं मुद्दों के समाधान की कोई योजना नहीं है। नियंत्रण रेखा (LoC) को गतिशील बनाने तथा आतंकियों की घुसपैठ कराने की उसकी नीति लगातार जारी रहेगी। भारत में गहरे पैठ कर आतंकी हमले करने की गुंजाइश को सीमित करने तथा उसे अपनी गतिविधियों को जम्मू-कश्मीर तक नियंत्रित रखने को विवश करने के लिए पाक पर एक मजबूत पारंपरिक बढ़त बनाये रखना आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय रूप से, दूसरे देश भारत के साथ आर्थिक निवेश के साथ-साथ सैन्य एवं सुरक्षा सहयोग करने के भी काफी ख्वाहिशमंद हैं। भारत को वृहद एशियाई क्षेत्र में एक विशुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की आवाज उसके मजबूत आर्थिक आधार और एक शक्तिशाली सशस्त्र बलों की वजह से सुनी जाती है। इसलिए, अगर देश और विकास करने तथा विश्व शक्ति के रूप में स्वीकार किए जाने की इच्छा रखता है तो इसके लिए सतत सैन्य आधुनिकीकरण और उन्नयन को बनाये रखना अनिवार्य है।

वर्तमान आम बजट ने सैन्य आधुनिकीकरण की योजना को पीछे धकेल दिया है। हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में रक्षा आवंटन में 7.81 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी हुई लेकिन जीडीपी में इसके हिस्से (1.58 प्रतिशत) के लिहाज से यह 1962 के बाद सबसे कम है। जब ट्रम्प नाटो देशों से अपने रक्षा बजटों में बढोतरी करने की मांग कर रहे थे, तो वह उनसे अपनी जीडीपी का कम से कम 2 प्रतिशत रक्षा पर आवंटित करने की बात कर रहे थे। आदर्श रूप से सेना हमेशा जीडीपी के 2.5 प्रतिशत की मांग करती रही है लेकिन इसके लिए 2 प्रतिशत से अधिक कोई भी संख्या न्यूनतम तो रखी ही जाने चाहिए थी जिस पर अनिवार्य रूप से विचार किया जाना चाहिए था।

बजट की एक और अजीब सी बात पूंजी के मुकाबले राजस्व का बढ़ा हुआ हिस्सा  है। जहां राजस्व का काम सेना की ‘भौतिक ताकत‘ को बनाये रखना है, पूंजी का काम बलों की क्षमताओं एवं सामर्थ्य में बढोतरी करना या ‘भविष्य के लिए बल‘ का सृजन करना है। 1,00,000 करोड़ रुपये से थोड़ा कम का पूंजीगत हिस्सा राजस्व का लगभग आधा है। पूंजीगत व्यय के लिए आवंटित राशि में से लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बकाया देयताओं (पहले की गई खरीद और बकाया भुगतान के लिए) के लिए आवंटित होता है, इस प्रकार नई खरीदों के लिए सीमित राशि ही बच जाती है।

लुटियंस दिल्ली के सुरक्षित एवं हिफाजतपूर्ण माहौल में बैठने वाले कई अर्थशास्त्रियों और टिपण्णीकारों ने दावा किया है कि सरकार ने सही कदम उठाया है क्योंकि बढे़ हुए बजट का अर्थ होगा अधिक सैन्य उपकरणों की खरीद, जो अनुपयोगी भी हो सकता है। यह एक असंतुलित दृष्टिकोण है, क्योंकि जब तक सेना के पास दुश्मनों को रोकने के लिए हथियार और क्षमता नहीं होगी, देश पर हमेशा खतरा मंडराता रहेगा। नाभिकीय शक्ति और मिसाइल एक अवरोधक की तरह कार्य कर सकते हैं, लेकिन पारंपरिक ताकत भी उतनी ही आवश्यक है।

विकास एवं सामाजिक सुरक्षा बनाम सैन्य ताकत की लड़ाई में, वित मंत्री संतुलन बनाने को विवश हैं। यह संतुलन विशेष रूप से चुनावी वर्ष होने के कारण सामाजिक सुरक्षा की ओर अधिक झुक सकता है। बहरहाल, राष्ट्रीय सुरक्षा को नजरअंदाज करना, खासकर जब जोखिम लगातार बढ़ता ही जा रहा है, देश को खतरे की तरफ धकेल सकता है।

तीनों सेनाएं आधुनिकीकरण और युद्ध में काम आने वाले अनिवार्य हथियारों की खरीद की पुरजोर मांग करती रही हैं। इस सीमित राशि के साथ, अधिक संभावना इसी बात की है कि सेना को अपनी आधुनिकीकरण योजनाओं को तिलांजलि देनी होगी क्योंकि नौसेना एवं वायु सेना की ताकत बढ़ाने की आवश्यकता बढ़ रही है। वित मंत्री को निश्चित रूप से अपने बजट प्रस्तावों पर फिर से विचार करना चाहिए, क्योंकि सरकार का एक हिस्सा होने के रूप में, वह देश को राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी देना चाहते हैं, जोकि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

 

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