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कितना भला होगा सैन्य समुदाय का हाल के चुनाव परिणामों से ?

भारतीय सेना के जवान
भारतीय जवान (फाइल फोटो )

हाल के विधान सभा चुनावों में सत्तारुढ़ भाजपा को कांग्रेस के सामने हार का सामना करना पड़ा है। संख्याओं के लिहाज से जब हम मतों के प्रतिशत, सत्ता विरोधी कारकों और हार के अंतर पर विचार करते हैं तो ये आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश कर सकते हैं, लेकिन हकीकत तो यही है कि बीजेपी इन चुनावों में बुरी तरह खेत रही है। जरूरी नहीं कि राज्य स्तर के चुनावों के परिणाम  राष्ट्रीय स्तर के चुनावों के परिणामों के भी संकेत देते हों, फिर भी यह बीजेपी को आत्मनिरीक्षण करने तथा अगले साल होने वाले आम चुनावों में इस प्रकार के नुकसान से बचने के लिए तैयारी और आवश्यक काम करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।





बीजेपी अब उन समुदायों को लुभाने की जुगत में लग जाएगी जिसे इसने नाराज किया है या जिनकी अनदेखी की है। भारत में सबसे सम्मानित समुदाय सशस्त्र बल समुदाय है जिसकी उपेक्षा किए जाने से समाज के दूसरे वर्ग भी नाराज हुए हैं। हालांकि इस सरकार ने आंशिक रूप से ही सही ओआरओपी को मंजूरी देने देने के जरिये वह काम किया है जो पिछली किसी भी सरकार ने नहीं किया। लेकिन खासकर हालिया दिनों में कुछ अन्य क्षेत्रों में अपने कदमों एवं फैसलों से सरकार ने सैन्य समुदाय को मायूस एवं नाराज भी कर दिया है।

अगर हम पुराने समय में जाएं तो जब वित मंत्रालय ने 7वें वेतन आयोग की अनुशंसाएं स्वीकार कीं तो सेना प्रमुखों ने एकमत से इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। उनकी मनाही के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसमें हस्तक्षेप किया। हालांकि अंत में इसे मंजूरी दे दी गई लेकिन कुछ विषमताएं रह गईं जिसका अब तक समाधान नहीं हो पाया है। ऐसा इसलिए है कि सरकार सशस्त्र बलों की तरफ से निश्चिंत है क्योंकि वह जानती है कि सशस्त्र बल न तो हड़ताल करेंगे और न ही इसका विरोध करेंगे। हाल के एक घटनाक्रम में वित मंत्रालय ने जेसीओ के मिलिटरी सर्विस पे (एमएसपी) को 5,500 रुपये से 10,000 रुपये तक बढ़ाने से संबंधित एक बड़ी विसंगति को ठुकरा दिया। इस फैसले ने समस्त सैन्य समुदाय और इसके समर्थकों को नाराज कर दिया है, क्योंकि इससे संबंधित राशि बेहद मामूली, केवल 600 करोड़ रुपये है।

हाल के दिनों में केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की अगुवाई में उठाए गए कुछ कदमों से भी सरकार एवं इसके साथ साथ सत्तारुढ़ दल के इरादों पर सवाल उठे हैं। छावनियों (कैंटोनमेंट) को आम जनता के लिए खोलने का एकतरफा फैसला एवं ‘मोदीकेयर‘ के तहत आने वालों के लिए सैन्य अस्पतालों को खोलने की कोशिशों और शॉर्ट सर्विस कमीशन प्राप्त अधिकारियों को चिकित्सा सुविधा रद्द करने के फैसलों से भी बहुत अधिक असंतोष फैला है।

हालांकि उन्होंने सैन्य बल न्यायाधिकरण (एएफटी) द्वारा मंजूर पेंशन संबंधी लाभों पर फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपीलों को कम करने के अपने इरादों की घोषणा की है लेकिन वास्तविकता में इसमें कोई आगे की कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। बताया जाता है कि ट्वीटर पर उन्होंने कहा, ‘ एएफटी में मामले सेना मुख्यालयों द्वारा निपटाए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपील रक्षा मंत्रालय के सिविल सेवाओं द्वारा सेना मुख्यालयों से प्राप्त इनपुटों के आधार पर ही की जाती है। उनका निहितार्थ यह था कि सेना मुख्यालय ही अपीलों के पीछे हैं, पर इसमें किसी की भी दिलचस्पी नहीं है। ‘मुकदमों में कमी लाने पर विचार करने‘ के उनके दावों में भी कोई सच्चाई नहीं दिखती क्योंकि वास्तव में उनमें कोई कमी नहीं आई है। पूरे देश को पता है कि उनके निर्देश देने से स्थिति बदल सकती है लेकिन इसके आसार दिख नहीं रहे।

इसी के साथ साथ सरकार ने एटीएफ रिक्तियों को भी भरने से मना कर दिया है जिससे वे लगभग व्यर्थ ही हो चुके हैं। इससे पूर्व-सैनिकों द्वारा न्याय मांगने की राह में आने वाली दुश्वारियों में इजाफा ही होगा। अन्य सभी सेनाओं को मंजूर गैर-कार्यशील उन्नयन (एनएफयू), जिसने नागरिक-सैन्य समानता को प्रभावित किया था, का विरोध करने के लिए उनके मंत्रालय द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण ने भी वर्तमान नेतृत्व के तहत रक्षा मंत्रालय का वास्तविक चेहरा उजागर कर दिया है।

यहां राजनेता सोच सकते हैं कि सैन्य समुदाय हमेशा असंगठित और राजनीति से दूर रहता है, लेकिन वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि प्रत्येक सैनिक परिवार एवं घनिष्ठ मित्रों के रूप में कई वोटों पर अधिकार रखता है। अगर उनके न्यायसंगत बकाया रकम की अनदेखी की गई तो नाराजगी बढ़ेगी जो अंततोगत्वा मतदान केंद्रों पर भी दिखेगी। इस प्रकार सैन्य समुदाय को एक असंगठित-संगठित समुदाय की संज्ञा दी जा सकती है।

बीजेपी को 13 सितंबर की रेवाड़ी की रैली, जिसमें मोदी ने कई विशेष वादे किए थे, के बाद सैन्य समुदाय की एक बड़ी संख्या का समर्थन हासिल हुआ था। इसकी उम्मीद जगने लगी थी कि सरकार 70 वर्षों की नाउम्मीदी और अनदेखी के बाद अब उन्हें उनका वांछित लाभ दे सकती है और सशस्त्र बलों का दर्जा बहाल कर सकती है। इस दिशा में, खासकर वन रैंक वन पेंशन (OROP) के मामले में कुछ प्रगति भी हुई। सैन्य समुदाय के कुछ सदस्यों को इतना भी स्वीकार्य हो सकता है। बहरहाल, सरकार ने पिछले कुछ महीनों के दौरान खासकर केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में रक्षा मंत्रालय ने जो कुछ फैसले किए हैं, उनसे नाराजगी जरूर बनी रहेगी।

अगर बीजेपी चाहती है कि वह फिर से इस असंगठित-संगठित समुदाय का समर्थन हासिल करे तो उसे उन फैसलों पर फिर से गौर करने की जरूरत है जो उसने पिछले कुछ महीनों के दौरान किए हैं और उन फैसलों को बदलने की जरूरत है जिनसे इस समुदाय का मनोबल प्रभावित हुआ है। अगर भाजपा पिछले कुछ वर्षों के दौरान रहे सेना के शानदार प्रदर्शन के दम पर वोट पाने का दावा करती है तो उसे उनकी दुश्वारियों के समाधान और सरकार में उनके विश्वास की कमी की समस्या पर भी गौर करने की इच्छुक नहीं होनी चाहिए। उसे याद रखना चाहिए कि देश किसी भी राजनीतिक दल की तुलना में सशस्त्र बलों से अधिक प्रेम करती है।

पार्टी भूल गई है कि सरकार के खिलाफ सैन्य समुदाय की लड़ाई कभी भी पैसों के लिए नहीं रही है, बल्कि न्याय, अधिकारों, रुतबा और अकेले रहने वाले परिवारों की सुरक्षा के लिए रही है। क्या प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर समुचित ध्यान देगा और रक्षा मंत्रालय को सकारात्मक रूप से कार्य करने का निर्देश देगा, यही अहम सवाल है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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