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अफगानिस्तान में शांति योजना कितनी कारगर ?

राष्ट्रपति अशरफ गनी

वाशिंगटन से ललित मोहन बंसल

दोहा में शांति समझौते के चंद घंटों बाद अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने 5,000 तालिबानी लड़ाकों को जेल से रिहा करने से मना कर दिया है। अशरफ़ कहते है कि प्रशासन ने तालिबान से सीधे बातचीत से पूर्व ऐसी शर्त पर सहमति ज़ाहिर नहीं की थी। अमेरिकी दिक़्क़त यह है, उसे समझौते की शर्तों के अनुसार 34 महीनों में अपनी सेनाओं की घर वापसी करनी है।  9/11 के आरोपी ‘अल क़ायदा’ पर अंकुश लगाने और मित्र देशों की सुरक्षा के लिए अफ़ग़ानी सरज़मीं को लांचिंग पैड नहीं बनने देने की तालिबान से पुख़्ता गारंटी तय करनी है। इस पर अमेरिकी मीडिया में सवाल उठाए जा रहे हैं- इन 34 महीनों में अमेरिकी सेना की भूमिका क्या  होगी? क्या तालिबान अल क़ायदा और इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को रोक पाएगा? पाकिस्तान में छिपे अल क़ायदा आतंकवादी काबुल में सत्ता पर क़ाबिज़ तालिबान की रोकटोक के बावजूद शरारत पर आमादा होते हैं, तो अमेरिका किसे अपना कंधा बना? संभव है, अमेरिकी और नाटो सेनाओं की घर वापसी के बाद तालिबान हस्तक्षेप पर तैयार न हो?  इंटेरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के प्रेज़िडेंट और सीईओ राबर्ट माले ने टिप्पणी की है, ‘ऐसा कोई भी समझौता नहीं है, जो पूर्ण हो। दोहा में शांति समझौते के समय भारत और पाकिस्तान के साथ सेंट्रल एशियाई देश मौजूद रहे।’





शनिवार को दोहा के  शेरेटन होटल में सम्पन्न शांति समझौते के समय अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो सहित भारत और पाकिस्तान सहित सेंट्रल एशियाई देशों के राजनयिक और प्रतिनिधि मौजूद थे । इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव सहित अनेक देशों ने सहमति जताई है। भारत की ओर से क़तर स्थित भारतीय राजदूत और फिर दिल्ली में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपना दृढ़ मत दोहराते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत हमेशा अफ़ग़ानिस्तान में शांति, सुरक्षा और स्थायित्व के उन सभी अवसरों की सराहना करता आया है। साथ ही भारत का यह भी दृढ़ मत रहा है कि शांति प्रक्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की अगुआई में, अफ़ग़ानिस्तान की ओर से संचालित हो और अफ़ग़ानिस्तान के नियंत्रण में हो। अभी तक भारतीय पक्ष की जीत हुई है। अफ़ग़ानिस्तान की अवाम ने इसकी सराहना की है। अशरफ़ गनी सरकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से 29 मई से पूर्व तालिबान को प्रतिबंधित सूची से हटवाने का प्रस्ताव देना है।

तालिबान अमेरिका और नाटो देशों की सैनिकों की वापसी की शर्त से उत्साहित है। तालिबान के डिप्टी कमांडर सिराजद्दीन हक्कानी ने ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ से कहा है, ‘आज की दुनिया में कोई राष्ट्र अलग-थलग नहीं रह सकता। वह महिलाओं की स्कूली शिक्षा और काम के अधिकार से वाक़िफ़ है। इस्लामिक रीतिनीति के अनुसार बराबरी के अधिकार देने को इच्छुक है।’ इस पर  अफ़ग़ान महिलाएँ तालिबान के इस भरोसे से संतुष्ट नहीं हैं।

अमेरिका ने अफ़ग़ान तालिबान को क़ानूनी जामा क्या पहनाया कि पाकिस्तान की सरज़मीं पर वर्षों पनपे, जेहाद और शरिया का झंडा बुलंद करने वाले तहरीक ए पाकिस्तान तालिबान (टीटीपी), जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए झांगवी आदि जेहादी संगठनों में हर्षोंन्माद छाह गया है। टीटीपी एक जेहादी संगठन है। सन् 2014 में एक आर्मी स्कूल में 135 बच्चों को बम विस्फोट से उड़ाए जाने पर पाकिस्तानी मिलिट्री ने मजबूरन उसे सीमा पार खदेड़ दिया था। अफ़ग़ान और पाकिस्तान, दोनों संगठनों के आका मुल्ला उमर थे। क्या अब  अफ़ग़ान तालिबान एक अन्य जेहादी ‘टीटीपी ’ को तरजीह देगा? इस समझौते से पाकिस्तान के मुल्ला और कट्टर इस्लामी ख़ुश हैं कि वे अब इमरान सरकार की नकेल कस सकेंगे। यह पाकिस्तान ही था, जिसने तालिबान सरकार को सब से पहले मान्यता दी थी और जब तालिबान की सत्ता गई तो उसी ने अमेरिकी प्रशासन की आँखों में धूल झौंकते हुए साझे आतंकवाद के नाम पर अरबों डालर डकारने में क़ोताही नहीं बरती। इसी पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबानी को अपनी सरज़मीं पर शरण दी थी और हक्कानी नेटवर्क से सीधे सम्पर्क बनाए रखा था। आज वही दावा कर रहा है कि उसी के प्रयासों से अमेरिका और तालिबान एक मेज़ पर बैठ कर वार्ता कर सके हैं ?

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