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सरकारी दफ्तर करें सशस्त्र बलों का सम्मान

पैरामिलिट्री फोर्सेज
प्रतीकात्मक फोटो

देश के सभी राज्यों को केंद्र सरकार के केंद्रीय गृह मंत्रालय के उस पत्र पर विशेष रूप से गौर करने तथा पूरी तरह अमल करने की जरूरत है जिसमें कहा गया है कि राज्य सशस्त्र बल (सेना और अर्धसैनिक बल) के जवानों, अधिकारियों, सेवानिवृत्त कर्मियों की समस्याओं का निराकरण प्राथमिकता से करें। केंद्र का यह निर्देश राज्यों के हुकमरानों के मारफत देश के ब्लॉक स्तर तक के दफतर तक पहुंचाने की जरूरत है। आज हकीकत यह है कि सशस्त्र बलों के जवान सीमित छुट्टियों में अपने काम के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटते हैं और चक्कर काटते-काटते ही उनकी छुट्टियां खत्म हो जाती हैं फिर वह वापस अपने-अपने तैनाती स्थल पर देश की सेवा में जुट जाते हैं। सराकर और समाज दोनों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। और यह उचित समय भी है।





आज हम नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट के पास बने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक समेत देश के कोने-कोने में पुलवामा के 40 जांबाज जवानों की शहादत की बरसी मना रहे हैं लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि पूरे सैन्यबलों के लिए यह होगी जब हम सभी उनकी प्रति संवेदनशील बनकर उनकी मदद के लिए हर वक्त खड़े हों और इस कर्तव्य में तत्परता भी दिखाई दे। पुलवामा के शहीदों को याद करते हुए यह बात सरकारी कर्मचारियों, हुकमरानों समेत देश के हर नागरिक शिद्दत से समझनी होगी कि सशस्त्र बलों के मौजूदा और देश की सेवा कर चुके जवानों के जज्बे का कोई सानी नहीं। इन्हीं की बदौलत हम चैन की नींद सो पा रहे हैं और काम कर पा रहे हैं। जब हम चैन की नींद सो रहे होते हैं तब ये जवान बर्फीली हवाओं, तपते रेत, दलदले इलाकों, खतरनाक जंगलों में अपने कर्तव्य का पालन कर रहे होते हैं। जरूरत पड़ने पर सरहद की सुरक्षा के साथ-साथ सुनामी, बाढ़, भूकंप और उपद्रव के दौरान मुस्तैद होकर हमारी रक्षा करते हैं और वापस बैरकों में चले जाते हैं।

लिहाजा उनका सम्मान सर्वोपरि है। सरहद से सड़क, सरकारी दफ्तरों, स्कूल-कॉलेज, गांव की पकडंडी तक जहां भी उन्हें सम्मान मिलता है तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उनका यही हौसला देश सेवा में काम आता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर राज्यों को लिखी गई केंद्र की चिट्ठी पर ध्यान देने की जरूरत है। दिक्कत यह है कि सरकारी बाबू यहं तक कि अफसर तक सशस्त्र बलों के जवानों को उनके काम के सिलसिले में बेवजह चक्कर कटवाते रहते हैं। जरूरत इस बात की है कि जवानों की समस्या का निराकरण निष्ठा, लगन व सम्मान के साथ हो।

केंद्र की राज्यों को लिखी चिट्ठी की यह बात भी ध्यान देने लायक है कि जिसमें कहा गया है कि न केवल जवानों बल्कि उनके स्वजनों के प्रति भी सरकारी दफ्तरों में सम्मानपूर्वक व्यवहार सुनिश्चित किया जाए। अक्सर देखने में आता है कि जवान या स्वजन किसी काम के सिलसिले में सरकारी दफ्तरों में जाते है तो न केवल उनके काम के साथ टालमटोल किया जाता है बल्कि उनके काम के लिए रिश्वत तक की मांग कर दी जाती है। यह जानते हुए भी कि वह देश की सेवा में तैनात है या उसके बेटे, पति या भाई ने देश की हिफाजत में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। ऐसे वीरों और परमवीरों के साथ अक्सर की जा रहीं करतूतें बेहद शर्मनाक हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उस कर्मचारी द्वारा देश की हिफाजत में तैनात जवान का असम्मान है। ऐसे कर्मचारियों को चिन्हित कर उनके साथ कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

साथ ही सशस्त्र बलों जिसमें तीनों सेनाएं और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, सीमा सशस्त्र बल आदि अर्धसैनिक बल शामिल हैं, के जवानों की गैर-मौजूदगी में इनके माता-पिता बच्चों, जमीन-जायदाद के मसलों अथवा और भी जिन मसलों पर भी सहयोग की जरूरत है उसे देश के प्रति अपना कर्तव्य मानकर अगर हर नागरिक अपना कर्तव्य दिखाएगा तो जवानों का हौसला और बढ़ेगा। क्यों कि देखा गया है कि कई बार घरेलू समस्याओं की वजह से ही जवान तनाव में रहते हैं और कई बार खुद को खत्म कर लेते हैं।

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