vishesh

कश्मीर में सेना के खिलाफ एफआईआर का प्रतिकार

सेना पर पत्थरबाजी

पत्थर फेंकने के जवाब में हुई शोपियां फायरिंग, जिसमें दो लोगों की मौत हुई, के बाद राज्य सरकार ने उस सैन्य अधिकारी सहित सेना के जवानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जो सेना की टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था, हालांकि दुर्घटना के समय वह अधिकारी मौजूद नहीं था। भीड़ ने सेना के हथियारों को भी छीनने की कोशिश की और यहां तक कि जेसीओ को मार डालने की भी कोशिश की, जिसका नतीजा फायरिंग के रूप में सामने आया।





एफआईआर में नामजद अधिकारी के पिता ने सर्वोच्च न्यायालय में राज्य सरकार के खिलाफ याचिका दायर कर एफआईआर को चुनौती दी। इसके साथ साथ, कुछ सैन्य अधिकारियों के बच्चों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से संपर्क किया और घाटी में कार्यरत सुरक्षा कर्मियों के लिए भी सुरक्षा एवं समान अधिकारों की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर पर स्टे दे दिया है और राज्य तथा केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

कई लोगों का तर्क है कि एफआईआर जांच का केवल एक माध्यम है, सेना के खिलाफ कोई आरोप नहीं है। बहरहाल, तथ्य यह है कि केवल जवानों के खिलाफ ही जांच की जा रही है, उन लोगों के खिलाफ नहीं, जिन्होंने पत्थर फेंकने की शुरुआत की जिसके कारण आत्मरक्षा में गोली चलाने की नौबत आई। यही वजह है कि पूरे देश में इस बात को लेकर आक्रोश पैदा हो गया है। AFSPA द्वारा सुरक्षा हासिल किए जाने के अतिरिक्त, आत्मरक्षा सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत भी कानूनी है। यह स्पष्ट रूप से राज्य सरकार के मन में सेना के खिलाफ पक्षपात का एक संकेत है जो इस घटना से राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहती है।

पहले सेना द्वारा एक जवाबी एफआईआर कराने की खबर थी जिसे बाद में स्पष्ट किया गया कि सेना के जवाब को भी उसी एफआईआर में नोट किया गया। सेना वहां पर किसी प्रयोजन से है, स्थानीय भावनाओं को भड़काने के लिए नहीं। वह कानूनी मुद्दों को निपटाने में नहीं उलझ सकती, जबकि गाडि़यों को तोड़ने, घायल जवानों और पत्थरों से पटी गलियां आसानी से साक्ष्य के लिए उपलब्ध है। अगर सेना ने पहले गोली चलाई होती तो इसका प्रमाण रहा होता क्योंकि तब बिना एक भी पत्थर चलाए, भीड़ तितर-बितर हो चुकी होती। यह निश्चित रूप से उकसावों के प्रत्युत्तर का एक स्पष्ट संकेत है।

सवाल उठता है आखिर अधिकारी के पिता एवं सैन्य अधिकारियों के बच्चों को क्यों न्यायालय और मानवाधिकार आयोग की शरण लेनी चाहिए जो काम रक्षा मंत्रालय और खुद सेना का दायित्व है। सेना कोई अपनी इच्छा से आतंकरोधी कार्यों में नहीं तैनात है। अफस्पा लागू है क्योंकि अन्य सुरक्षा एजेन्सियां हालात को काबू में नहीं ला सकीं और उन्होंने सेना की तैनाती की इच्छा जताई जो सरकार की सबसे बड़ी ताकत होती है। यहां तक कि खुद महबूबा मुफ्ती ने हाल में जम्मू कश्मीर विधान सभा में ऐलान किया था कि अफस्पा को हटाने का अभी उचित समय नहीं आया है। यह सर्वविदित तथ्य है कि सेना कभी भी गोली नहीं चलाती जब तक उसे लक्षित न किया जाए और जब वह गोली चलाती भी है तो उसका निशाना अराजक समूह के कुछ चुने हुए कुछ खास तक सीमित होता है।

राज्य सरकार के कदम का निशाना निश्चित रूप से सेना के मनोबल को तोड़ना और उन स्थानीय लोगों के दिलों को ठंडक पहुंचाना था जो इसमें शामिल थे। यह तथ्य कि राज्य सरकार ने पत्थर फेंकने से जुड़े हजारों युवकों के खिलाफ सभी आरोपों को वापस ले लिया है, यह कदम उन्हें इसके लिए और अधिक उकसाएगा क्योंकि अब वह जान गए हैं कि उन पर कभी भी कार्रवाई नहीं की जाएगी। यह हुर्रियत को भी अब कम पैसे में भी उन्हें भड़काने का अवसर दे देगा क्योंकि उन्हें भरोसा है कि अब उनके खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

स्थानीय जनता का भी यह दावा कि जो लोग गोली से मारे गए हैं या घायल हुए हैं, वे पत्थर फेंकने वाले नहीं बल्कि बगल में खड़े होकर तमाशा देखने वाले थे, तर्क से परे है। पत्थर फेंकना कोई खेल प्रतियोगिता नहीं होती कि लोग बगल की सीटों पर बैठ कर इसका नजारा देखें। सेना केवल उन्हीं लोगों को निशाना बनाती है जो इस करतूत में आगे बढ़ कर भाग लेते है, इसलिए इसका निशाना सामने से पत्थर फेंक रहे चुनिंदा लोग ही हो सकते हैं।

राज्य सरकार ने खुले आम प्रदर्शित किया है कि हालांकि वह चाहती है कि सेना वहां मुस्तैद रहे, लेकिन वह हमेशा सेना के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित रह्रेगी और अपने लोगों का समर्थन करती करेगी। इस मुद्दे पर केंद्र और सेना के अधिकारियों की चुप्पी ने सैन्य अधिकारी के पिता एवं अन्य सैनिकों के बच्चों को कानूनी सहायता लेने को विवश किया है। हालांकि देश ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन रक्षा मंत्रालय एवं सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की खामोशी उस क्षेत्र में मुस्तैद जवानों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। अब समय आ गया है कि सेना इस घटना को लेकर अपना पक्ष देश के सामने रखे, अपना रुख स्पष्ट करे और उन लोगों का बचाव करे जिन्हें निशाना बनाया गया है।

Comments

Most Popular

To Top