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बातचीत के लिए माहौल बनाने की जिम्मेदारी पाकिस्तान की

इमरान खान

पाकिस्तान में इमरान खान की ताजपोशी में नवजोत सिंह सिद्धू की मौजूदगी और उनका पाक सेना प्रमुख को गले लगाने के बाद बेहद तल्ख आलोचनाओं का दौर शुरु हो गया। पाक से वापसी के बाद सिद्धू इमरान और बाजवा की तर्ज पर वह अमन की बात करने लगे । ऐसा लगा मानो वह पाक का कोई संदेश दे रहे हों। चीन के विदेश कार्यालय ने अभी हाल ही में कहा है कि चीन दोनों देशों को बातचीत के टेबल पर लाने में योगदान देने का इच्छुक है।





उधर, इमरान भी बातचीत के लिए लगातार संकेत दे रहे हैं। एक ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘आगे बढ़ने के लिए पाकिस्तान और भारत को अनिवार्य रूप से बातचीत करनी चाहिए और कश्मीर सहित अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।’  उन्होंने व्यापार में भी इजाफा करने की इच्छा जताई।

पाकिस्तान या भारत में ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ है जिसने अपने कार्यकाल के आरंभ में इससे दीगर कोई बात कही हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क के सभी देशों के प्रमुखों को आमंत्रित कर लिया था और नवाज शरीफ की नातिन की शादी के दिन उन्हें बधाई देने लाहौर तक चले गए। नवाज अपने कार्यकाल की पूरी अवधि के दौरान भारत-पाक शांति की बात करते रहे।

इसलिए इमरान खान भी वही धुन गुनगुना रहे हैं जिसकी किसी भी प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है। बड़ा अंतर इमरान और पाक सेना प्रमुख, जिनका देश पर नियंत्रण है, के बीच की धारणा में है। इमरान ने पाक की सरजमीं से उपजने वाले आतंकवाद, उनके देश द्वारा वैश्विक आतंकवादियों को दी जा रही आजादी या मुंबई तथा पठानकोट पर आतंकी हमलों के पीछे खड़े लोगों को सजा दिलाने के बारे में एक भी लफ्ज नहीं कहा। यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब अपने चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने हाफिज सईद सहित आतंकी नेताओं, जिनके प्रत्याशियों ने चुनाव भी लड़ा था, उनसे समर्थन मांगा था।

उनके नवीनतम बयान में उल्लेख है कि कश्मीर बातचीत के लिए प्रमुख मुद्दा है। दूसरे मसले इसके बाद आएंगे। इस प्रकार उन्होंने सेना के रुख का ही समर्थन किया है कि ‘कश्मीर या किसी और मुद्दे पर बातचीत करो, लेकिन हम आतंकियों या घुसपैठियों को भेजना बंद नहीं करेंगे।’

इसमें कोई संदेह नहीं कि पाक की ज्यादातर समस्याएं भारत के साथ उसकी दुश्मनी का अप्रत्यक्ष नतीजा हैं। सेना की ताकत, एक अत्याधिक रक्षा बजट देश को निम्न विकास के साथ कर्ज में डुबो रहा है, चीन पर अति-निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी, सार्क की विफलता एवं अमेरिका के साथ दुश्मनी, कमोबेश भारत के साथ उसके मतभेद के ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम हैं।

भारत के लिए, पाकिस्तान किसी पिन की चुभन से कुछ अधिक नुकसानदायक है। वह कश्मीर को उकसाना और घुसपैठियों को भेजने की कोशिश जारी रखेगा। पाक को चीन के समर्थन का भारत अभ्यस्त हो चुका है जिसने भारत को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में सीमित रूप से प्रभावित किया है।

बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ भारत अब एक अंतरराष्ट्रीय ताकत है। पूरी दुनिया में उसके संपर्कों ने उसका रुतबा बढ़ा दिया है। वैश्विक नेता भारत के लिए इच्छुक रहते हैं लेकिन वे पाकिस्तान जाने से कतराते हैं। भारत अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेन्सियों को योगदान देता है जबकि पाक कर्ज माफी की गुहार लगा रहा है। इस तरह कई तरीकों से भारत ने पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया है और विकास के रास्ते पर वह काफी आगे बढ़ चुका है।

बहरहाल, भारत को अनिवार्य रूप से अपने इस नाभिकीय शक्ति संपन्न पड़ोसी का कोई जरुरी बंदोबस्त करना चाहिए। भारत इससे भलीभांति वाकिफ है कि पाक की राजनीति जो जुबान बोलती है, उसकी सेना उसके विपरीत तथा बिल्कुल अलग जुबान बोलती है। जाहिर है, पाक के अल्फाज और उसकी करनी अलग-अलग दिशाओं में है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने इमरान को एक सामान्य सा पत्र लिखा, जिसकी किसी प्रधानमंत्री से अपेक्षा भी की जाती है। लेकिन उसमें कोई वादा, कोई ऑफर या आगे के किसी रास्ते का जिक्र नहीं था, केवल संबंधों में सुधार लाने की एक उम्मीद भर जताई गई थी।

मोदी सरकार को निकट समय में ही चुनाव का सामना करना है और ऐसे में वह अपनी पाक नीति में परिवर्तन करने को जोखिम मोल लेना नहीं चाहेगी। वह पाकिस्तान में कोई स्ट्राइक करने के द्वारा एक कदम आगे और दो कदम पीछे धकेले जाने का जोखिम नहीं ले सकती। उसे लाभ उसी सूरत में हो सकता है जब पाक पहले कदम उठाए और घुसपैठियों को भेजना बंद कर दे और भारतीय प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करे। अगर जमीन पर कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो कम से कम वर्तमान में सार्क शिखर सम्मेलन को नजरअंदाज करते हुए इसे इसे बहुत हद तक यथास्थिति भी माना जा सकता है।

इसलिए वर्तमान परिदृश्य में, बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी विश्वास पैदा करने की जिम्मेदारी पाक पर है। अगर राजनीतिक नेतृत्व केवल ट्वीट या भाषणों तक ही सीमित रहता है तो अच्छा है कि इसकी अनदेखी कर दी जाए। पाकिस्तान को निश्चित रूप से बातचीत शुरू करने के प्रति वास्तविक इच्छा प्रदर्शित करनी चाहिए और यह भी जताना चाहिए कि सत्ता के पीछे की असली ताकत इसके लिए राजी है।

कोई भी अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री पाकिस्तान को यही सुझाव देगा कि भारत के साथ रिश्तों में सुधार पाक के सामने वर्तमान में मौजूद अधिकांश समस्याओं का हल कर देगा। उसे विकास का भी लाभ हासिल हो सकता है। हालांकि पाकिस्तान के 70 वर्षों से अधिक के इतिहास में ऐसा कोई भी राजनेता नहीं हुआ है जो उसके सैन्य नेतृत्व, जो भारत के खिलाफ दुश्मनी को अपनी ताकत बढ़ाने के एक माध्यम में इस्तेमाल करता रहा है, को यह बात समझा सके।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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