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भारत की ताकत के आगे बेबस है चीन

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

स्वर्गीय राष्ट्रपति डा. ए पी जे  अब्दुल  कलाम ने कहा था कि ताकत ही ताकत का सम्मान करती है। डा. कलाम की यह उक्ति आज चीन के साथ चल रहे तनाव की पृष्ठभूमि में काफी समीचीन दिखती है। भूटान के दावे वाले डोकलाम भूभाग पर आज भारतीय सेना चीनी सेना के सामने दो महीने से डटकर खड़ी है तो केवल इसलिये कि भारत एक ताकतवर सैन्य ताकत बन चुका है। हालांकि भारत की सैन्य ताकत चीन की तुलना में काफी कमजोर है लेकिन भारत के पास इतनी ताकत तो है ही कि भारत पर किसी तरह का  छोटा या  सीमित या फिर बड़ा  सैन्य हमला करने के पहले चीन कई बार सोचेगा। हालांकि चीन की सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी और सरकारी मीडिया में भारत को जम कर कोसा जा रहा है और धमकाया जा रहा है लेकिन भारत इसे ऐसे देख रहा है जैसे उसके  कान पर जूं तक नहीं रेंगा हो। चीन हैरान है कि आखिर भारत डर क्यों नहीं रहा है।





चीन समझता है कि उसके पास सैंकड़ों परमाणु मिसाइलें हैं  जिसकी भयावह विनाशलीला की क्षमता से भारत कांप उठेगा लेकिन  भारत यदि इन धमकियों को नजरअंदाज कर रहा है तो केवल इसलिये कि वह भी इतनी ताकत रखता है कि वह चीन को लहुलूहान कर सकता है ।

हमारी यह कहावत भी चीन के साथ चल रही तनातनी के मद्देनजर चरितार्थ होती है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस । भारत ने डोकलाम इलाके में अपनी लाठी के बल पर चीनी सैन्य दल को आगे बढऩे और सडक़ बनाने से रोक दिया।  चीन ने कभी सोचा नहीं था कि भारत भी अपनी लाठी भांज सकता है।   डोकलाम विवाद की पृष्ठभूमि में भारत को एक बार फिर सबक मिला  है कि जब तक आपके पास मजबूत  लाठी नहीं होगी आपकी  कोई इज्जत नही करेगा। 1962 के युद्ध के पहले भारत  मजबूत सैन्य तैयारी में भरोसा नहीं करता था इसलिये 62 के युद्ध के बाद भारत को एक बड़ा सबक मिला कि विश्व बिरादरी में सिर उठा कर रहना है तो सैनिक ताकत हासिल करनी होगी। 1962 के युद्ध के बाद से ही भारत ने अपने सैन्य खर्च में भारी इजाफा करना शुरू किया और 1974 में पहली बार जब परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका सहित सारी पश्चिमी दुनिया भारत के पीछे हाथ धो कर पड़ गई।

भारत पर इतनी तरह की तकनीकी बंदिशें लगा दी गईं कि भारत फिर  कभी परमाणु हथियार  हासिल करने के बारे में नहीं सोचे लेकिन भारत में अब्दुल कलाम जैसी कई वैज्ञानिक  हस्तियां थीं जिन्होंने भारत को बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु बम अपनी तकनीकी क्षमताओं पर दिलाए। भारत  ने जब 1998 में दोबारा परमाणु परीक्षण किये तो कुछ साल तक भारत को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से बाहर रखने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत से अपनी सामरिक साझेदारी मजबूत करने का फैसला किया और पहली बार सोचा कि एक ताकतवर भारत को चीन के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है। अपनी  चौंकाने वाली आर्थिक सफलता हासिल करने के बाद चीन अब पूरी दुनिया में अपनी आर्थिक और सैनिक ताकत के बल पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है लेकिन अकेला भारत ही था जिसने वन बेल्ट वन रोड की चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना का बहिष्कार करने की हिम्मत  दिखाई।  शायद चीन इसी बात से चिढ़ा  है  लेकिन वह भारत की ताकत के आगे बेबस है।

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