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रक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव है सीडीएस की नियुक्ति

बिपिन रावत और पीएम मोदी

पिछले वर्ष दिसंबर के अंत में सरकार ने घोषणा की कि जनरल बिपिन रावत डिफेंस स्टाफ के पहले चीफ (सीडीएस) होंगे। सरकार ने रक्षा मंत्रालय (एमओडी) के भीतर सैन्य मामले विभाग (डीएमए) के गठन की भी घोषणा की जिसके अध्यक्ष वही होंगे। डीएमए सेवारत तथा सेवानिवृत्त अधिकारियों और नौकरशाहों का मिला जुला संस्थान होगा। वर्तमान में तीन मेजर जनरल रैंक के अधिकारियों, तीनों सेनाओं से एक-एक की डीएमए का हिस्सा बनने की घोषणा की गई है। वे संभवतः पूरी तरह सेनाओं से जुड़े सैन्य मामलों से संबंधित विभागों के प्रमुख होंगे। अतिरिक्त स्टाफ के बारे में और कोई जानकारी नहीं दी गई है जिन पर तार्किक रूप से काम किया जा रहा होगा।





इसके साथ साथ रक्षा मंत्रालय  ने एक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी कि जिसमें कहा गया कि नए डीएमए में दो संयुक्त सचिव, 13 उप सचिव, 25 अवर सचिव तथा 25 अनुभाग अधिकारी होंगे। इसका अर्थ यह हुुआ कि डीएमए में दो विभागों के प्रमुख नौकरशाह होंगे और तीन के प्रमुख सेवारत अधिकारी होंगे। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी इनपुट के आधार पर ऐसी धारणा बनाई जा रही है कि डीएमए में नौकरशाहों का दबदबा होगा और सशस्त्र बल पृष्ठभूमि में धकेल दिए जाएंगे।

रक्षा मंत्रालय ने सीडीएस के लिए भी चार्टर जारी किया। तीनों सेनाओं से संबंधित सभी सैन्य मामलों से निपटने के अतिरिक्त, डीएमए के पास अन्य जिम्मेदारियां भी होंगी। इनमें सभी प्रारंभिक प्रशिक्षण अकादमियों तथां डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज सहित सभी प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान शामिल हैं। यह सेना विशिष्ट संस्थाओं को प्रबंधित नहीं करेगा। यह सभी सेनाओं में जेसीओ और उसके नीचे के कैडर प्रबंधन और को भी संभालेगा। अलावा इसके पड़ोसी देशों के साथ सैन्य कूटनीति होगी। संक्षेप में सीडीएस सेनाओं का प्रशिक्षण और स्टाफिंग तथा पड़ोसी देशों को प्रबंधित करेगा।

कमान के मोर्चे पर सीडीएस अंडमान एवं निकोबार कमान, साइबर एवं अंतरिक्ष एजेनियों को कमान करेगा। वह सभी अन्य संयुक्त कमानों को प्रशासित करेगा और न्यूक्लियर कमान एजेंसी का सलाहकार होगा, रक्षा योजना निर्माण परिषद, रक्षा योजना निर्माण समिति तथा रक्षा अधिग्रहण परिषद का सदस्य होगा।

सीडीएस पूंजीगत अधिग्रहणों के अतिरिक्त तीनों सेनाओं से संबंधित सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा। इस प्रकार, बुनियादी ढांचे का प्रबंधन उसकी जिम्मेदारी होगी। डीएमए योजना निर्माण और खरीद में संयुक्तता एवं स्वतंत्र बलों के संयुक्त कमानों में पुनर्गठन को भी बढ़ावा देगा।

इसके अलावा सीडीएस हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) का प्रमुख होगा, साथ ही चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी का भी स्थायी अध्यक्ष होगा। इस भूमिका मेंएचक्यू आईडीएस उसकी सहायता करेगा। इसी से इसका संकेत मिलेगा कि डीएमए का एक व्यापक चार्टर है और इसलिए उसके भीतर कई विभागों को रखने की आवश्यकता होगी, जिसमें से प्रत्येक का प्रमुख या तो सेवारत या सिविलियन अधिकारी होगा।

डीएमए रक्षा मंत्रालय के भीतर सिविलियन और सैन्य अधिकारियों के मिश्रण को रखने वाला पहला ऐसा विभाग होगा। इसकी सफलता प्रत्येक सेना से सर्वश्रेष्ठ हासिल करने के लिए सृजित इसकी संगठनात्मक संरचना में निहित होगी। जैसे ही डीएमए में नियुक्ति की फाइनल सूची जारी हो जाएगी, इसकी वास्तविक संरचना सामने आ जाएगी।

डीएमए का सृजन और सीडीएस की नियुक्ति रक्षा के उच्चतर प्रबंधन में एक क्रांतिकारी बदलाव है। उनकी कई भूमिकाओं के अनुरूप ही विभागों को कार्य करने की आवश्यकता होती है। केवल सैन्य या सिविलयन विभाग का सृजन करने से ऐसे संगठन के निर्माण का उद्वेश्य ही समाप्त हो जाएगा। एक मिश्रित रक्षा मंत्रालय एक अंतरराष्ट्रीय मानदंड है और इसका अंगीकरण किया जाना चाहिए। अंतिम संगठनात्मक संरचना समय व्यतीत होने के साथ आकार लेगी और इसलिए आलोचकों को तब तक धैर्य रखना चाहिए जब तक कि इसे अंतिम रूप से मंजूरी न दे दी जाए।

भारत ने काफी हद तक उच्चतर रक्षा प्रबंधन का ब्रितानी मॉडल अपना रखा है जहां रक्षा मंत्री के दो सलाहकार होते हैं, सीडीएस और रक्षा सचिव के समकक्ष। इसमें एक बड़ा अंतर, जिसका अस्तित्व लगातार बना हुआ है, वह है राष्ट्रीय रक्षा के लिए जिम्मेदारी। भारत में राष्ट्रीय रक्षा का उत्तरादायित्व लगातार रक्षा सचिव के कंधों पर बना रहता है न कि सीडीएस पर। इसमें समय के साथ परिवर्तन हो सकता है।

इसके अतिरिक्त, जनरल बिपिन रावत, जिन्हें विभाग का प्रमुख हहोने के लिए नामांकित किया गया है, सीओएएस रहे हैं और वर्तमान सेना प्रमुखों से वरिष्ठ हैं। इस विभाग के प्रमुख के रूप में उनका चयन उस विश्वास की वजह से है, जो उन पर राजनीतिज्ञों का बना हुआ है। यह विश्वास और अनुभव उन्हें उस एजेंडा को आगे बढ़ाने की ताकत देता है जो उनके लिए निर्धारित किया गया है। साथ ही, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना है कि देश इस प्रकार के संगठन से लाभान्वित हो, बजाये कि यह रक्षा मंत्रालय के पहिये का महज एक और आरा बन कर रह जाए। आलोचकों के लिए यह एक कदम पीछे हटने और डीएमए की विस्तृत संगठनात्मक संरचना का इंतजार करने का वक्त है। इसके अलावा इस संगठन को शांत होने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इसकी उपयोगिता साबित करने के लिए समय देने की जरुरत है।

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