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समर नीतिः बंदूक की नोंक पर तो नहीं हो सकती बात

लम्बे अर्से बाद भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक होते-होते रह गई। 34 महीने तक ना नुकुर करते रहने के बाद भारत की विदेश मंत्री पाकिस्तान के विदेश मंत्री से मिलने को तैयार हुईं तो भारत में इसके औचित्य पर सवाल उठने लगे थे। इसलिये कि एक ओर पाकिस्तान सभी मसलों पर रचनात्मक बातचीत की पेशकश करता है और दूसरी ओर सीमा पार आतंकवादी हरकतें करवाते रहने से बाज नहीं आ रहा। भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री सितम्बर के चौथे सप्ताह में न्यूयार्क में मिलने का औपचारिक ऐलान भारत की ओऱ से किया गया लेकिन जब जम्मू-कश्मीर में बर्बर आतकंवादी हरकतें जारी रहीं तो भारत में सरकार पर घरेलू दवाब काफी बढ़ने लगा।





बैठक के लिये काफी हिचक के बाद तैयार होने के बाद भारत ने कहा था कि यह एक बैठक मात्र है न कि वार्ता प्रक्रिया की शुरुआत। भारत की दुविधा यह है कि जब भी पाकिस्तान के साथ बातचीत का दौर चलाना शुरू करने की बात की है पाकिस्तान की ओर से कोई बड़ा आतंकवादी हमला हो जाता है। इस बार भी क्या ऐसा ही होता? क्या भारत एक बार फिर कोई बड़ा आतंकवादी हमला झेलने को तैयार रहे?  2008 में जब 26/11 का मुम्बई पर आतंकवादी हमला हुआ था तब उन्हीं दिनों पाकिस्तान के विदेश मंत्री नई दिल्ली में ही थे और मुम्बई पर चल रहे हमले के बीच रातों-रात पाक विदेश मंत्री को पाकिस्तान ने अपना विमान भेज कर स्वदेश बुलाया था। दिसम्बर, 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब पिछली बार इस्लामाबाद गई थीं तब भी पाकिस्तान के साथ रचनात्मक बातचीत का नया दौर शुरू करने पर सहमति  दे आईं थीं। लेकिन पाकिस्तानी सेना के मंसूबे कुछ और थे और एक पखवा़डा भी नहीं बीता कि पठानकोट वायुसैनिक अड्डे पर बड़ा हमला करवाया और इससे भी मन नहीं भरा तो उड़ी में सैन्य छावनी पर हमला बोल दिया।

इसी शंका के माहौल में भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक का ऐलान भारत ने किया ।  पिछले बरसों में पाकिस्तान की ओर से हो रही आतंकवादी हरकतें जब रुकने के कोई आसार नहीं दिखे तो पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये 29 सितम्बर, 2016 को नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक भी कर दिया। पर पाकिस्तान अपनी आतंकवादी हरकतों से बाज नहीं आ रहा। एक बार फिर जब पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री इमरान खान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिख कर भारत के साथ बातचीत बहाल करने का आग्रह कर रहे थे उन्हीं दिनों जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के एक जवान को पहले गोलियों से मार कर उसका गला काटा जा रहा था।

इसके बावजूद भारत एक बार फिर पाकिस्तान के साथ उच्चस्तरीय बैठक के लिये तैयार हुआ था।  आतंकवाद की भारत की शिकायत के मद्देनजर इमरान खान ने अपने पत्र में कहा था कि आतंकवाद पर भी बात कर लेंगे लेकिन उनका जोर जम्मू-कश्मीर पर बात करने का ही था। भारत ने हमेशा कहा है कि भारत जम्मू-कश्मीर पर भी बात करेगा लेकिन बंदूक की नोंक पर नहीं। पाकिस्तान पहले सीमा पार आतंकवादी हरकतें बंद करे और नियंत्रण रेखा व अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी पूरी तरह रोकने के लिये 2003 में जो संघर्षविराम समझौता हुआ था उसका अक्षरश: पालन करे।

न्यूयार्क में दोनों विदेश मंत्रियों की बैठक के लिये जरूरी था कि पाकिस्तान कुछ दिनों के लिये अपनी आतंकवादी हरकतों पर लगाम लगाता। पाकिस्तान इन दिनों गम्भीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है और यदि उसे अपनी जनता को इस संकट से उबारना है तो भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने होंगे। इसके लिये जरूरी है कि पाकिस्तान आतंकवाद पर पूरी तरह रोक लगा कर भारत के साथ रचनात्मक बातचीत करे। बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के लिये न्यूयार्क में एक स्वर्णिम अवसर पाकिस्तान को मिला था जिसे पाकिस्तान ने एक बार फिर खो दिया है।

 

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