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सेना का सम्मान सर्वोपरि

अरुणाचल प्रदेश के तवांग में एयरफोर्स हेलिकॉप्टर क्रैश में शहीद हुए सैनिकों के शवों को पॉलीबैग और पेपर बॉक्स में रखे जाने की तस्वीर हतप्रभ तो करती ही है, सेना की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ी करती है। ड्यूटी पर तैनात, वतन की खातिर मर मिटने के जज्बे के साथ यदि कोई जवान शहीद हो जाता है तो क्या उसके शव के साथ इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना आचरण उचित है। जिस तरह देश सर्वोच्च, सर्वोपरि है उसी तरह जीवित अथवा शहीद सैनिक का सम्मान भी सर्वोपरि है। उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ अथवा निर्मोही आचरण दुखद है और यह सेना की इस क्षेत्र की कार्यप्रणाली को दागदार बनाता है।





देश में अनुशासन का नाम ही भारतीय सेना है। पिछले हफ्ते अरुणाचल प्रदेश में एयरफोर्स का हेलिकॉप्टर हादसे का शिकार हो गया था। जिसमें सात सैनिक शहिद हो गए थे। सेना के एक पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल ने जब शवों को पॉली बैग में लपेटकर पेपर बॉक्स में रखे जाने की तस्वीर ट्वीट की तो विवाद खड़ा होना स्वाभाविक था। मामला केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तक पहुंचा तो बाद में सेना ने ट्वीट कर शवों को स्थानीय संसाधनों में रखकर भेजे जाने के बात को असमान्य माना और कहा कि भविष्य में शवों को लकड़ी के बक्से या ताबूत में ले जाने के लिए सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन सेना की ये बात देश में करोड़ों देशवासियों के गले उतरती नहीं दिख रही।

पूरे देश में सेना के तीनों अंग, अर्धसैनिक बल, पुलिस का जाल बिछा है। समुद्रतटीय इलाका हो या करगिल-सियाचिन जैसे दुर्गम स्थल, रेगिस्तान या मैदान या कोई शांत क्षेत्र सभी जगह इनकी मौजूदगी दर्ज है। दुर्घटनाएं या शहादत अपने हाथ में नहीं है लेकिन हर तरह की चाक-चौबंद तैयारी सैन्य अथवा पुलिस तंत्र के हाथ में जरूर होती है। क्या हम यह भी नहीं कर सकते ? जबकि रक्षा विभाग के नियम कानूनों में शहीद के सम्मान का विशेष उल्लेख है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पूरी दुनिया में अनुशासन और आचरण के मानकों में भारतीय सेना पहली पंक्ति में आती है। अरुणाचल प्रदेश की यह घटना सबक के तौर पर हमारी तैयारियों को और पुख्ता बनाने की ओर इंगित करती है ताकि शहीद के शव के साथ किसी भी तरह लापरवाह चूक न हो सके।

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