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85 साल की वायुसेना- कितनी सक्षम ?

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

भारतीय वायुसेना 85 साल की हो चुकी है। सेनाएं जैसे-जैसे उम्रदराज होती जाती हैं उनकी लड़ाकू क्षमता भी बढ़ती जाती है लेकिन भारतीय वायुसेना के साथ ऐेसा नहीं लगता। वायुसेना में जिस गति से पुराने लडाकू विमान रिटायर हो रहे हैं उस गति से नये लड़ाकू विमानों को शामिल नहीं किया जा रहा है। इसकी एक वजह यह है कि पिछले दो दशकों के दौरान सरकारें नये लड़ाकू विमानों को हासिल करने को लेकर जरूरी फैसले लेने से हिचकती रही हैं। यही वजह है कि जिस वायुसेना के पास आज 42 स्क्वाड्रन लड़ाकू विमान होने चाहिये वे 33 पर रह गये हैं। इनमें से 11 स्क्वाड्रन विमान सुखोई-30 एमकेआई,  तीन मिग-29,  तीन मिराज-2000,  छह जगुआर,  आठ मिग-21 और दो मिग-27 के हैं।





वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी. एस. धनोआ ने वायुसेना दिवस के मौके पर दावा किया कि योजना के मुताबिक 42 स्क्वाड्रनों की संख्या 2032 तक यानी आज से 15 साल बाद ही पूरी की जा सकेगी। इनमें से आठ मिग-21 और दो मिग-27 को रिटायर करने का वक्त आ गया है लेकिन इन्हें किसी तरह खींचा जा रहा है ताकि वायुसेना लडऩे लायक बनी रहे।

कुछ दिनों पहले वायुसेना प्रमुख ने कहा था कि भारतीय वायुसेना की हालत वैसी ही है जैसे कि किसी क्रिकेट टीम में केवल सात खिलाडिय़ों का ही होना। इस बयान से सामरिक हलकों में काफी चिंता पैदा हुई थी लेकिन अब वायुसेना प्रमुख ने अपना बयान पलटते हुए कहा है कि अकेले केवल पाकिस्तान या चीन से ही नहीं बल्कि चीन और पाकिस्तान दोनों एक साथ भारत पर हमला बोल दें तो उनका मुकाबला करने को भारतीय वायुसेना तैयार है। हालांकि पाकिस्तान की वायुसेना की हालत भी खस्ता ही चल रही है और चीन की वायुसेना तिब्बत में जिस तरह के संसाधन तैनात कर सकती है वह भारत के लिये चिंता की बात नहीं है लेकिन आज की तारीख में भारतीय वायुसेना के पास भी जो हवाई संसाधन हैं वे काफी घटे हुए स्तर पर आ गए हैं। दुश्मन की वायुसेना पर हमला करने के  लिये निश्चय ही रूस से हासिल 11 स्क्वाड्रन लड़ाकू विमान ( एक स्क्वाड्रन में करीब 18 से 20 विमान ) का इस्तेमाल किया जाएगा लेकिन सुखोई -30 एमकेआई विमानों का बेड़ा भी पूरी स्वस्थ हालत में नहीं है। किसी एक वक्त पर सुखोई-30 के करीब 55 प्रतिशत बेड़ा को ही हमला करने लायक हालत में तैयार कहा जा सकता है। यानी सुखोई-30 के पूरे स्क्वाड्रन भी करीब आधी क्षमता से ही लड़ सकेंगे।  फ्रांस से जो 36 राफेल विमान आने हैं वे अगले साल के अंत से ही वायुसेना को मिल सकेंगे। इसके अलावा सुखोई-30 एमकेआई के 40 और विमान भी दो से तीन साल में आ जाएंगे। लेकिन हम जिस 40 एलसीए( मार्क-1) और 83 एलसीए (मार्क-1ए ) को अगले कुछ साल में शामिल करने की बात कर रहे हैं उनकी क्षमता पर खुद वायुसेना को भरोसा नहीं है। एक इंजन वाले जिस लड़ाकू विमान को देश में ही सामरिक साझेदारी के तहत बनाने की बात चल रही है उसका फैसला कब तक लागू हो पाएगा कहना मुश्किल है। हमारे प्रतिद्वंद्वी देश जरूर ही भारतीय वायुसेना की इस क्षमता का आकलन कर चुके होंगे। सैन्य तैयारी में इस कमजोरी को भांप कर पड़ोसी देश दुस्साहस कर बैठें तो हैरानी नहीं होगी।

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