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BSF के इस जवान ने बंजर जमीन पर खड़ा कर दिया जंगल

रुद्रप्रयाग। आसपास के इलाके में वह ‘जंगली जी’ के नाम से जाने जाते हैं। दरअसल उन्हें यह नाम मिला है उनके जुनून की वजह से। जुनून पेड़-पौधे लगाने का, जुनून जंगल विकसित करने का। बंजर जमीन को उन्होंने हरे-भरे जंगल में क्या बदला लोग उन्हें प्यार से जंगली जी पुकारने लगे। वैसे उनका असली नाम है जगत सिंह चौधरी। सीमा सुरक्षा बल (BSF)  से रिटायर होने के बाद जगत सिंह ने अपना पूरा जीवन पेड़-पौधों और जंगल के नाम कर दिया।





उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के कोट मल्ला गांव के इस पर्यावरण प्रेमी ने उस बंजर जगह को हरे-भरे जंगल में बदला जिसके बारे में लोग ही नहीं कृषि पंडित भी यह सोचते थे कि यहां पेड़-पौधे लगाना संभव नहीं है। कोट मल्ला गांव के पास डेढ़ एकड़ बंजर जमीन में पेड़-पौधे लगाने का काम जगत सिंह ने 1974 में शुरू किया और इसे पूरी तरह से हरा-भरा जंगल बनाने में उन्हें बरसों लग गए।

पेड़-पौधे लगाने की कहानी भी दिलचस्प है। बरसों पहले एक घटना ने उन्हें झकझोर दिया। गांव की महिलाओं को मवेशियों के चारे के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ता था। एक दिन उन्होंने देखा कि चारे का इंतजाम करने गई उनके गांव की एक महिला बुरी तरह से घायल हो गई है। उन्होंने उसी वक्त सोचा कि क्यों न ऐसा कुछ किया जाए कि मवेशियों के लिए चारे और ईंधन के लिए लकड़ियों का इंतजाम आसपास ही हो जाए। यह बात सत्तर के दशक की है। जगत सिंह उन दिनों सीमा सुरक्षा बल में कार्यरत थे। पिता से मिली डेढ़ एकड़ बंजर जमीन को उन्होंने हरा-भरा बनाने की ठान ली। उन्होंने बंजर जमीन के चारों ओर ऐसे पौधे लगाए जो बाड़ का काम कर सकें और आसानी से उग सकें जैसे नागफनी। इसके बाद उन्होंने ऐसे पौधे लगाने शुरू किए जो चारे और ईंधन के काम आ सकें। यह सब काम जब वह छुट्टियों में घर आते तब करते।

वर्ष 1980 में उन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपना सारा समय जंगल को विकसित करने में देने लगे। दूर से पानी खुद कंधों पर लाते और पौधों में डालते। मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी। बंजर जमीन पर पेड़-पौधे लहलहाने लगे। जगत सिंह की कामयाबी देख दूसरे भी प्रेरित हुए और आज सिर्फ डेढ़ एकड़ ही नहीं आसपास का इलाका भी हरा-भरा हो उठा है। जगत सिंह ने सिर्फ चारे और ईंधन की समस्या का ही समाधान नहीं किया अपितु उन्होंने औषधीय पौधे, दाल, सब्जियां, जड़ी-बूटी और फूल उगाने का प्रयोग भी किया। कहने की जरूरत नहीं कि वह कामयाब रहे। उनका सारा समय पेड़-पौधों के बीच बीतता, इसलिए लोग उन्हें प्यार से ‘जंगल जी’ बुलाने लगे।

देर से ही सही लेकिन सरकार ने भी उनके काम को सराहा। वर्ष 1998 में भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने उन्हें वृक्षमित्र पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 2012 में उन्हें उत्तराखंड का ग्रीन एम्बेसडर बनाया गया। पर्यावरण प्रहरी, गौरा देवी अवार्ड, पर्यावरण प्रहरी सरीखे ढेरों पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं। हालांकि उनके पास पर्यावरण की कोई डिग्री नहीं है लेकिन स्कूल-कॉलेजों में जब भी पर्यावरण पर कोई सेमीनार होता है लेक्चर देने के लिए सबसे पहले उन्हें ही बुलाया जाता है।

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