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फोन पर पत्नी से कहा,आतंकियों का खात्मा करके ही दम लूंगा

शहीद जवान जसवंत सिंह

गुडगांव। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों का मुकाबला करते शहीद हुए जसवंत सिंह उस वक्त आतंकियों की गोलियों का जवाब दे रहे थे जब उनकी पत्नी रेखा का फोन आया। जसवंत सिहं ने अपनी पत्नी को कहा, वह इस समय आतंकियों से लड़ रहे हैं। आतंकी उनसे 20 मीटर दूर पुलिस लाइन फैमिली क्वार्टर में घुसे हुए हैँ। वह और उनके साथी आतंकियों का सफाया करके ही दम लेंगे।





सीआरपीएफ के जवान जसवंत सिंह की अपनी पत्नी रेखा से यह आखिरी बातचीत थी। पत्नी रेखा ने शनिवार सुबह आठ बजे टेलीविजन पर मुठभेड़ पर समाचार देखने के बाद पति का हालचाल लेने के लिए फोन किया था। ग्यारह बजे जब रेखा ने दोबारा फोन किया तो फोन किसी दूसरे ने उठाया और बताया कि जसवंत दूसरी जगह गये हैं और अपना फोन यही छोड़ गये हैं।

जसवंत सिंह और उसके साथियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकियों का मुकाबला किया और पुलिस लाइन से 36 परिवारों को सुरक्षित निकाल लिया। इस मुठभेड़ में सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अंततः आतंकवादियों को मार गिराया। मुठभेड़ में आठ जवान भी शहीद हुए।

शहीद जवानों में से एक जसवंत सिंह भी थे। वह हरियाणा के गुड़गांव के पास गांव शेखूपुर माजरी के रहने वाले थे। छत्तीस वर्षीय जसवंत सिंह सीआरपीएफ में बतौर सिपाही कार्यरत थे। इन दिनों वह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में तैनात थे। पांच भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटे जसवंत सिंह जून में ही छुट्टी काटकर लौटे थे। सबसे छोटे होने की वजह से जसवंत परिवार में सबके लाडले थे। छुट्टियों में उन्होंने अपना समय परिवार के साथ आगरा और अन्य जगहों पर घूमने में बिताया था। पत्नी उन पलों को याद कर भावविह्वल हो उठती हैं। पिता रणधीर सिहं (90 वर्ष) को बेटे के जाने का दुख तो है लेकिन गर्व भी है कि बेटा देश के काम आया। रणधीर सिंह के पाचं बेटों में से चार सेना और सुरक्षा बलों में हैं। जसवंत की चंद्रो देवी को गर्व है कि उनका शेर बेटा आतंकियों को मारकर शहीद हुआ।

राजकीय सम्मान के साथ रविवार जसवंत सिंह को अंतिम विदाई दी गई। उनके मासूम बेटे आठ वर्षीय केशव ने मुखाग्नि दी। प्रशासन ने गांव के स्कूल का नाम शहीद जसवंत सिंह के नाम पर रखने का ऐलान किया है।

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