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समर नीति: चीन को पीछे जाने को ऐसे किया मजबूर

भारतीय सेना
फाइल फोटो

पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में चीनी सेना के सामने जिस तरह डटकर भारतीय सेना खड़ी रही और चीनी दैनिक ग्लोबल टाइम्स की धमकियों को नजरअंदाज करते हुए जिस तरह भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने चीन को कड़ा संदेश देते हुए राष्ट्रीय संकल्प का इजहार किया उसके मद्देनजर चीन झुकने को मजबूर हुआ और 05 जुलाई को दोनों देशों के सीमा मसलों पर विशेष प्रतिनिधियों की जब बातें हुईं तो वे सीमांत इलाकों में आगे बढ़ने वाली चीनी सेना को पीछे हटाने को तैयार हुए।





इस सहमति के अनुरुप चीनी सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के पीछे तक लौटकर पांच मई से पहले की यथास्थिति बहाल करना था। इसके अनुरुप कुछ इलाकों में तो चीनी सेना पीछे हटती हुई दिखी लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण पैंगोंग झील इलाके में पीछे हटने की वह तेजी नहीं दिखी तो भारतीय सामरिक हलकों और मीडिया में शंकाएं जाहिर की जाने लगीं कि चीनी सेना अपनी रणनीति के अनुरुप चालें चल रही है कि वह दो कदम आगे बढकर एक कदम पीछे जाने को सौहार्दपूर्ण समझौता कहता है।

जब भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा चीन की इस चाल को कामयाब नहीं होने देने का कडा संदेश दिया गया तो चीन को लगा कि अब भारत के खिलाफ उसकी चाल उलटा असर दे रही है। शायद इसीलिये यहां चीनी राजदूत सुन वेई तुंग ने एक विशेष वीडियो शुक्रवार को जारी कर अपने तेवर नरम करने के संकेत देते हुए भारत को नसीहत दी कि वे चीन के साथ मतभेदों को झगडे में नहीं बदले। गत पांच मई से भारत-चीन के पूर्वी लद्दाख के सीमांत इलाकों में भारतीय सेना के साथ तनातनी करने के बाद चीन ने भारत के क़डे रुख को देखते हुए अपने तेवर नरम किये और कहा कि हम दो हजार सालों से दोस्त रहे हैं। हम पडोसी हैं और आपस में दुश्मन नहीं।

राजदूत के मुताबिक गत पांच जुलाई को दोनों देशों के सीमा मसलों पर विशेष प्रतिनिधियों के बीच हुई वार्ता में जो सहमति बनी है उसे लागू किया जाएगा। गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख के जिन इलाकों में भारत और चीनी सेनाएं गत पांच मई से आमने सामने तैनात हो गई थीं और इस वजह से गत 15 जून को गलवान घाटी में खूनी झडप भी हुई थी वहां से अब चीनी सेनाएं पीछे हटने लगी हैं। चीनी सेना गलवान घाटी के अलावा हाट स्प्रिंग, गोगरा आदि इलाकों से भी पीछे हटने लगी है। पैंगोंग झील के जिस इलाके को लेकर यह शंका थी कि चीन वहां से नहीं हटेगा वहां से भी चीनी सैनिकों द्वारा अपने साज सामान पीछे करने की प्रकिया शुरु करने की रिपोर्टें हैं।

चीनी राजदूत को इतना बडा विवाद पैदा होने और रिश्तों में भारी तनातनी पैदा होने के बाद याद आई कि भारत और चीन के बीच दो हजार साल का दोस्ताना आदान प्रदान का इतिहास रहा है। इसमें से अधिकांश वक्त में दोस्ताना सहयोग का ही दौर रहा है। चीनी राजदूत के मुताबिक सहयोग से दोनों को फायदा होता है और तनाव से किसी को लाभ नहीं होता। दो बडे पडोसी देश होने के नाते यह स्वाभाविक है कि हमारे बीच कुछ मतभेद हों लेकिन इनके प्रबंध के लिये हम वार्ता करते रहे हैं. हमें हमेशा इस बात को ध्यान में रखना होगा कि समग्रता में दिवपक्षीय रिश्तों को देखें और मतभेदों को अपनी जगह पर रहने दें और देखें कि मतभेदों की वजह से आपसी रिश्तों पर असर पडे।

चीनी राजदूत द्वारा इस पहलू पर जोर देना अहम है कि चीन और भारत के बीच सीमा का सवाल इतिहास की देन है जो संवेदनशील और जटिल है। हमें इसका एक न्योयोचित और समुचित समाधान निकालना होगा जो परस्पर मान्य हो। इस मसले का अंतिम समाधान निकलने तक हमें सीमांत इलाकों में शांति व स्थिरता को बनाए रखना होगा। चीन की ओर से ऐसे तर्क पिछले तीन दशकों से दिये जा रहे हें लेकिन सवाल यही उठता है कि आखिर कब तक इस विवाद का हल नहीं निकलेगा।

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