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स्पेशल रिपोर्ट: तिब्बत के धार्मिक नेता दोरजी के विदेशी पासपोर्ट लेने से बदले हालात

ओग्येन त्रिनले दोरजी

नई दिल्ली।  तिब्बत के धार्मिक नेता औऱ खुद को 17वें करमापा कहने वाले ओग्येन त्रिनले दोरजी के भारत नहीं लौटने के बारे में यहां सूत्रों ने साफ किया है कि जब से उन्होंने डोमिनिकन  रिपब्लिक का पासपोर्ट हासिल किया है उन्होंने भारत आने के लिये वीजा का आवेदन नहीं किया है।





तिब्बत के धार्मिक नेता किशोरावस्था में ही पिछले दशक के शुरू में तिब्बत से पलायन कर भारत आ गए थे। तब भारत ने उन्हें शरण दी थी। यहां सूत्रों ने कहा कि भारत आज भी उन्हें एक शरणार्थी के तौर पर देखता है औऱ करमापा के तौर पर उन्हें मान्यता नहीं दी गई है।

भारत औऱ चीन के बीच रिश्तों में यह मसला संवेदनशील हो सकता है इसलिये भारत सरकार फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहती है। चीन ने भी त्रिनले दोरजी को करमापा के तौर पर मान्यता दी है। त्रिनले दोरजी को 17वें करमापा के तौर पर मान्यता के दौर पर तिब्बती बौद्ध समुदाय के बीच गम्भीर विवाद चल रहा है।

सूत्र ने कहा कि करमापा दोरजी को भारत में रहने के लिये एक परिचय पत्र जारी किया गया था जिसमें साफ कहा गया है कि यदि कभी भी वह किसी दूसरे देश का पासपोर्ट हासिल करेंगे इसकी जानकारी वह भारतीय अधिकारियों कों देंगे। लेकिन करमापा ने ऐसा नहीं किया। विदेशी पासपोर्ट हासिल होने पर शरणार्थी के तौर पर उनका परिचय पत्र स्वतः ही  रद्द माना जाएगा।

गौरतलब है कि  32 साल के  करमापा मई, 2017  से अमेरिका में रह रहे हैं और वहीं रह कर उन्होंने डोमिनिकन रिपब्लिकन का पासपोर्ट हासिल किया। यहां भारतीय सूत्र ने कहा कि शरणार्थी के तौर पर दोरजी को  कुछ सुविधाएं जैसे वाहन औऱ सुरक्षा आदि  दी गई थीं जो उनके भारत लौटने पर भी बहाल रहेंगी। करमापा तिब्बत के मठ से भारत भाग कर आने के बाद सिक्किम के रुमटेक मठ  चले गए थे । उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए भारत सरकार दुविधा में रही है।

सिक्किम में रहने वाले खाग्यू पंथ के लोग त्रिनले दोरजी को 1981 में स्वर्गवासी हुए 16वें करमापा का असली उत्तराधिकारी मानते हैं। सिक्किम सरकार ने भी केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि दोरजी को रुमटेक मठ में 17वें करमापा के तौर पर रहने दिया जाए। त्रिनले दोरजी का जन्म तिब्बत में हुआ था औऱ वह नेपाल के रास्ते साल 2000 में भारत भाग कर आए थे।  करमापा  को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने की सुविधा दी गई लेकिन वह  दिल्ली में अपना मठ खोलने के लिये जमीन के आवंटन की मांग भारत सरकार से करते रहे हैं।  केन्द्र सरकार ने इस आशय का फैसला ले लिया था लेकिन इस बीच उनके अमेरिका जाने से हालात बदल गए।

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