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देशभक्ति पर बनी फिल्म जिसने युवाओं पर छोड़ी गहरी छाप

रंग दे बसंती

रंग दे बसंती: वर्ष 2006 में प्रदर्शित हुई ‘रंग दे बसंती’ सही मायने में ऐसी फिल्म है जिसने लोगों को हिलाकर रख दिया। फिल्म का कथानक दर्शकों को बेचैन कर देता है। क्लाइमेक्स में पर्दे पर जिस तरह देश भर के युवा व्यवस्था के प्रति जैसा रोष जाहिर करते हैं, कुछ वैसा ही आक्रोश फिल्म देखकर सिनेमा हाल से बाहर निकलते दर्शकों को अनुभव होता है। इक्कीसवीं सदी के युवाओं पर फिल्म ने गहरी छाप छोड़ी है। बिना नारों के भी देशभक्ति की फिल्म बनाई जा सकती है, इसकी चंद मिसालों में से एक रंग दे बसंती भी है।





फिल्म ऐसे चंद युवाओं डीजे (आमिर खान), करण (सिद्दार्थ), असलम (कुणाल कपूर) और सुक्खी (शरमन जोशी) की कहानी है जिनके लिए मौज-मस्ती ही सब कुछ है। एक ब्रिटिश फिल्मकार सू अपने दादा की डायरी पढ़कर भगत सिहं और उसके साथियों पर डॉक्यूमेंट्री बनाने भारत आती है तो उसका साबका इन चारों दोस्तों से पड़ता है। वह इनमें भगत सिंह, चन्द्रेशखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक सरीखे किरदार देखती है, लेकिन ये उनके बारे में ज्यादा जानते तक नहीं हैं। लेकिन, जैसे-जैसे ये उनके बारे में जानना शुरू करते हैं, उनके व्यवहार में बदलाव आने लगता है। एक विमान हादसे में अपने दोस्त की मृत्यु के बाद उन्हें लगता है कि देश बेशक अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो चुका है, लेकिन आज भी भ्रष्टाचार सरीखी कई बुराइयां उसे जकड़े हुए हैं। भ्रष्ट तंत्र और व्यवस्था के खिलाफ ये दोस्त एक लड़ाई छेड़ देते हैं।

राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी यह फिल्म मील का पत्थर मानी जाती है। प्रसुन जोशी के गीत और एआर रहमान का संगीत आज भी युवाओं में जोश भर देता है।

 

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