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स्वतंत्रता दिवस स्पेशलः ये जो देश है तेरा, स्वदेश है..

फिल्म स्वदेश

तरक्की किसे कहेंगे। सिर्फ खुद को काबिल बना लेना, खुद के लिए सुविधाएं जुटा लेना या फिर हम जिस समाज में रह रहे हैं उसे आगे बढ़ाने के लिए काम करना। कुछ इसी तरह के सवालों को लेकर आशुतोष गोवारीकर ने वर्ष 2004 में स्वदेश फिल्म का निर्माण किया। लगान की रिकार्ड तोड़ कामयाबी के बाद स्वदेश हालांकि बॉक्स आफिस पर खास चल नहीं पाई लेकिन जहां तक विचार की बात है, गुणवत्ता की बात है, स्वदेश उस कसौटी पर खरी उतरती है।





स्वदेश की थीम प्रतिभा पलायन है। डाक्टर हम तैयार करते हैं, वैज्ञानिक हम बनाते हैं लेकिन इसका फायदा पश्चिम के देश उठा रहे हैं। अनाथ मोहन भार्गव (शाहरुख खान) नासा में वैज्ञानिक है। वह अपनी दाई मां (जिसने उसे पाला है) को अमेरिका ले जाने के लिए भारत आता है। दाई मां मोहन को किसी न किसी बहाने देश के गांव के हालात से परिचित कराती है। मोहन को यह देखकर अजीब लगता है कि यहां के लोग किस तरह ऊंच-नीच के भेद और दकियानुसी बातों में फंसे हुए हैं। मोहन दाई मां को अमेरिका चलने के लिए कहता है लेकिन दाई मां इंकार कर देती है। मोहन अमेरिका लौट जाता है लेकिन वहां उसे भारत में बिताए दिन याद आते हैं और अहसास होता है कि अपने आंगन का पेड़ दूसरे को फल दे उससे क्या फायदा।

कहने का तात्पर्य यह कि मोहन है भारतीय लेकिन वह योगदान दे रहा है पराये देश की तरक्की में। वह अंतरिक्ष को नापने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसके गांव के लोग बिजली तक को तरस रहे हैं। वह भारत लौट आता है और अपने गांव वालों जिन्दगी में रोशनी लाने के काम में जुट जाता है।

स्वदेश ऐसी चंद फिल्मों में से एक है जिसमें शाहरुख ने सही मायनों में अभिनय किया है। बॉक्स आफिस पर फिल्म भले ही नहीं चल पाई, लेकिन यह फिल्म देखकर कई प्रवासी भारतीय सब कुछ छोड़छाड़ कर भारत लौट आये और ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे हैं। किसी भी फिल्म के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या हो सकती है।

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