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स्वतंत्रता दिवस स्पेशलः पूरब-पश्चिम का भेद बताती फिल्म

फिल्म पुरब और पश्चिम

फिल्म उपकार के तीन साल बाद वर्ष 1970 में मनोज कुमार ‘पूरब और पश्चिम’ लेकर आए। यह वह दौर था जब पाश्चात्य संस्कृति देश में अपने पैर पसार रही थी। फैशन की आड़ में भारतीय युवा अपनी संस्कृति और मूल्यों से कटते जा रहे थे। फिल्म उन लोगों पर चोट करती है जिन्हें अपने देश में सब कुछ खराब और पश्चिम में सब कुछ अच्छा दिखाई देता है। फिल्म उन लोगों की व्यथा भी दिखाती है जो बेहतर जिंदगी की आस में विदेश तो चले गये लेकिन भारतीय संस्कृति से कट गये।





फिल्म एक ऐसे युवक भारत (मनोज कुमार) की कहानी है जो उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाता है। उसे यह देखकर बुरा लगता है कि वहां रह रहे भारतीय किस तरह अपने मूल्यों और संस्कृति से कट गये है। पश्चिमी रंग में रंगे वे लोग किस तरह अपने ही देश और देशवासियों को कमतर करके देखते हैं। फिल्म का वह दृश्य अदभुत है जिसमें बरसों से इंग्लैंड में रह रहा हरनाम (प्राण) भारत से पूछता है कि है कोई बात तुम्हारे देश की जिस पर तुम गर्व कर सको। तुम्हारे देश का कंट्रीब्यूशन जीरो है जीरो…। भारत पलटकर जवाब देता है… जब जीरो दिया मेरे भारत ने तब दुनिया को गिनती आई… तारों की भाषा भारत ने दुनिया को पहले सिखलाई…। कहने का तात्पर्य यह कि गीत के माध्यम से भारत की खासियतें बता कर भारत हरनाम को निरुत्तर कर देता है।

फिल्म में इसी तरह के कई प्रसंग है जो न सिर्फ भारत की श्रेष्ठता बताते हैं बल्कि दर्शकों का सिर गर्व से ऊंचा कर देते हैं। उपकार की तरह इस फिल्म का गीत-संगीत भी सिर चढ़कर बोला। है प्रीत जहां की रीत सदा…, दुल्हन चली ओ पहन चली तीन रंग की चोली…, पूरबा सुहानी आई रे…, कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे…सरीखी गीत दशकों बाद आज भी खूब गुनगुनाए जाते हैं।

पूरब और पश्चिम का भेद बताने वाली यह फिल्म सही मायनो में मील का पत्थर बन गई। बाद के बरसों में तो इसी थीम पर दर्जनों फिल्में बनी, लेकिन कोई भी पूरब और पश्चिम जैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाई। आज 47 साल बाद भी फिल्म दर्शकों को गर्व से भर देती है।

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