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स्वतंत्रता दिवस स्पेशलः भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई..

ऋषिकेश मुखर्जी की 'सत्यकाम'

अकसर देशभक्ति की श्रेणी में वे फिल्में आती हैं जो बाहरी दुश्मनों से लड़ने और मुकाबला करने की बात करती हैं। पर जो देश के भीतर दुश्मन हैं उनका क्या। खासतौर से ऐसा दुश्मन जो दिखाई नहीं देता। भ्रष्टाचार एक ऐसा ही दुश्मन है जो देश को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार से लड़ना भी देशभक्ति है। इस लिहाज से ऋषिकेश मुखर्जी की ‘सत्यकाम’ निश्चित ही ऐसी फिल्म है जो देश के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करती है। देश के प्रति समर्पण ही तो देशभक्ति है।





साठ के दशक के आखिर में आई सत्यकाम की पृष्ठभूमि आजादी के आसपास की है। वह दौर निश्चित ही आज के दौर से बहुत बेहतर था, लेकिन भ्रष्टाचार उस समय भी बड़ी बीमारी था। फिल्म की शुरूआत वर्ष 1946 से होती है। कालेज में पढ़ रहे सत्यप्रिय (धर्मेंद्र) और उसके दोस्त आजादी की आहट को भांप ऐसे देश के निर्माण की कल्पना करते हैं जहां बेईमानी, कालाबाजारी, शोषण जैसी बुराइयों का नामोनिशान तक नहीं होगा। देश की आजादी के साथ ही सत्यप्रिय और उसके दोस्त कालेज से निकलकर देश निर्माण के सपने के साथ अलग-अलग जगह नौकरी करने लगते हैं। पर, नौकरी के दौरान सत्यप्रिय को बेहद कड़वे अनुभव होते हैं। कदम-कदम पर उसका साबका बेईमानों से पड़ता है। इसलिए किसी भी जगह वह ज्यादा नहीं टिक पाता। उसने जिंदगी में जो पढ़ा है, सीखा है, वैसा ही उसके आचरण में है।

अन्याय, शोषण उसे बर्दाशत नहीं होता। फिल्म का एक प्रसंग अदभुत है। सत्यप्रिय अपने आफिस में एक सहयोगी को रिश्वत लेने के आरोप में निलंबित कर देता है। निलंबित कर्मचारी की पत्नी सत्यप्रिय से सवाल करती है कि उसका बच्चा बिना दवा-दारू के मर रहा है क्या पड़ोसी होने के नाते इसमें उन्हें कोई पाप नहीं दिखता। क्या राजा को कोई पाप नहीं लगता? कर्मचारी की पत्नी और सवाल करती है कि आप कमजोर को सजा दे सकते हैं क्या राजा को सजा दे सकते हैं?

सत्यप्रिय उस कर्मचारी की दशा के लिए खुद को दोषी मानते हुए रात को ही आफिस लौटता है और कर्मचारी को निलंबित करने वाले पत्र को फाड़कर अपना इस्तीफा भेज देता है।

वस्तुतः फिल्म ताकत के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल करती है। ताकत का इस्तेमाल जनता के हित में, उसके कल्याण के लिए करना चाहिए। फिल्म की खासियत यह है कि नायक किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ लड़ने की बजाए व्यवस्था से लड़ता है, अपने आप से लड़ता है। अन्याय और शोषण के खिलाफ वह स्वयं को सजा देता है। फिल्म के एक दृश्य में उसका दोस्त नरेन (संजीव कुमार) जब उसे कहता है कि दादाजी को सच बताने की क्या जरूरत थी, सत्यप्रिय कुछ यूं कहता है-सच हथेली पर रखें अंगारे के समान होता है। आप यह सोचें कि हथेली जलेगी नहीं तो यह संभव नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह कि सच के रास्ते पर चलना आसान नहीं है। आपका सच आपके परिजनों को आपको परेशान नहीं करेगा, यह संभव नहीं है।

फिल्म में उपनिषद की एक कथा भी है जो कहती है कि किसी भी स्थिति में सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। नारायण सान्याल के उपन्यास पर बनी इस फिल्म की एक खासियत इसके संवाद भी हैं जिन्हें राजिंदर सिंह बेदी ने कागज पर उतारा था। धर्मेन्द्र का अविस्मरणीय अभिनय फिल्म के विषय को बेजोड़ बनाता है। सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर अगर कदम लड़खड़ाने लगें तो यह फिल्म एक बार देख लें,यकीन मानिए फिर कभी सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ेंगे।

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