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स्वतंत्रता दिवस स्पेशलः देश के दुश्मनों पर ‘प्रहार’

क्या देश को सिर्फ बाहरी दुश्मनों से खतरा है? क्या देश के भीतर दुश्मन नहीं हैं? एक सैनिक के सामने देश के भीतर ही बॉर्डर जैसे हालात हो जायें तो वह क्या करे? कुछ ही ऐसे सवालों के जवाब ढूंढती है वर्ष 1991 में प्रदर्शित फिल्म प्रहार। इस फिल्म का निर्देशन किया था प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर ने।





फिल्म मेजर प्रताप चौहान (नाना पाटेकर) के इर्द-गिर्द घूमती है। प्रताप चौहान सेना का जाबांज अधिकारी है। असंभव शब्द उसकी डिक्शनरी में नहीं है। अपने हर अभियान को वह सफलतापूर्वक अंजाम देता है। उसे कमांडो को ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी मिलती है। ट्रेनिंग लेने वालों में पीटर नामक एक युवा भी है। मेजर चौहान का प्रशिक्षण देने का तरीका और अनुशासन ट्रेनिंग लेने वाले सभी युवाओं को लगभग रुला देता है। सभी पीठ पीछे मेजर चौहान की चुगली करते हैं, लेकिन वक्त के साथ मेजर चौहान के साथ उनका आत्मीय रिश्ता बन जाता है। एक अभियान के दौरान पीटर की टांगों को नुकसान पहुंचता है और उसे सेना छोड़नी पड़ती है।

पीटर मेजर चौहान को अपनी शादी के लिए आमंत्रित करता है। मेजर चौहान जब पीटर के घर पहुंचता है तो पता चलता है कि गुंडों ने उसकी हत्या कर दी। वह इंसाफ के लिए आवाज उठाता है, लेकिन कहीं उसकी सुनवाई नहीं होती। इधर गुंडों की गुंडागर्दी थमने का नाम नहीं लेती। घर के भीतर के इन दुश्मनों से मेजर चौहान खुद निपटने का फैसला करता है और गुंडों का सफाया कर देता है। मामला कोर्ट में पहुंचता है, जहां मेजर चौहान के तर्क दर्शकों को सोचने को मजबूर कर देते हैं।

कमांडों ट्रेनिंग के दृश्य फिल्म की खासियत हैं। फिल्म अनुशासन की बात संजीदगी से उठाती है। माधुरी दीक्षित और डिंपल कपाड़िया को बिना मेकअप के परदे पर उतारने का साहस नाना पाटेकर ही कर सकते थे। बॉक्स आफिस पर फिल्म हालांकि खास नहीं रही, लेकिन फिल्म में उठाए गए सवाल आज भी प्रासंगिक हैं।

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