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स्वतंत्रता दिवस स्पेशलः खेलें हम जी जान से…

फिल्म खेले हम जी जान से...

देश को आजादी किसने दिलाई? कोई भी इस सवाल के जवाब में ढेरों नाम गिना देगा। लेकिन सच यह है कि आजादी की लड़ाई में उन गुमनाम लोगों का योगदान उनसे कहीं ज्यादा है, जिन्हें हम जानते हैं। चटगांव विद्रोह के बारे में कितने लोग जानते हैं? कितने लोग हैं जिन्होंने सूर्यसेन का नाम सुना है? स्वतंत्रता संग्राम के सूर्यसेन सरीखे ऐसे ही गुमनाम नायकों को रोशनी में लाने का साहस दिखाया आशुतोष गोवारीकर ने। वर्ष 2010 में प्रदर्शित उनकी फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ चटगांव विद्रोह पर आधारित है।





बच्चों के खेल के मैदान पर अंग्रेजों के कब्जे की घटना किस तरह चटगांव के लोगों को एकसूत्र में बांध देती है, फिल्म में इसे पूरे जज्बात के साथ दर्शाया गया है। हालांकि कथानक के केन्द्र में स्कूल अध्यापक सूर्यसेन (अभिषेक बच्चन) है लेकिन फिल्म वस्तुतः उस जज्बात को सामने लाती है जो सूर्यसेन और उनके 63 साथियों को अपनी जान की बाजी लगाने के लिए प्रेरित करती है। अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए सूर्यसेन शस्त्रागार लूटने की योजना बनाता है। अपने साथियों को वह प्रशिक्षित करता है कि एक साथ कई जगहों पर कैसे और किस तरह हमला करना है। सब कुछ योजना के साथ होता है। हमले से घबराकर अंग्रेज भाग खड़े होते हैं। सूर्यसेन और उसके साथी शस्त्रागार तक पहुंचने में कामयाब रहते हैं, लेकिन एक जानकारी के अभाव से उनका मिशन फेल हो जाता है। दरअसल उन्हें यह पता ही नहीं था कि अंग्रेज हथियार एक जगह रखते हैं और गोलियां कारतूस दूसरी जगह। उन्हें हथियार तो मिल जाते हैं, लेकिन गोलियों के बगैर किसी काम के नहीं हैं।

जल्द ही दूसरी जगह से अंग्रेजों को मदद पहुंचनी शुरू हो जाती है। और शुरू हो जाता है विद्रोह में शामिल क्रांतिकारियों की धर-पकड़ का सिलसिला। सूर्यसेन के कई साथी मारे जाते हैं और कई पकड़े जाते हैं। सूर्यसेन को फांसी पर लटका दिया जाता है।

परिणाम की दृष्टि से चगांव का विद्रोह भले की अधूरा लगे, लेकिन सूर्य सेन और उसके साथियों की कुर्बानी ने लोगों में आजादी के लिए ललक पैदा कर दी। फिल्म इस भाव को पूरी संवेदना के साथ दिखाती है।

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