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जस्टिस दीपक मिश्रा के वो 5 फैसले..

जस्टिस दीपक मिश्रा

नई दिल्ली। देश के नए मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस दीपक मिश्रा ने सोमवार को शपथ ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें देश के 45वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई। जस्टिस मिश्रा ने कई महत्वपूर्ण फैसले किए। पर ज्यादा चर्चा उस फैसले की हुई जिसमें उन्होंने सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया था। आइए जानते हैं जस्टिस मिश्रा द्वारा दिए गए वो 5 आदेश जिन्होंने उन्हें चर्चा में ला दिया:





थिएटर में राष्ट्रगान अनिवार्य किया

पिछले साल 30 नवंबर को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने आदेश दिया था कि पूरे देश में सिनेमाघरों में फिल्म की शुरुआत से पहले राष्ट्रगान चलाया जाए। आज जब भी सिनेमा घरों में नेशनल एंथम बजता है तब सिनेमा हॉल में मौजूद तमाम लोग खड़े होते हैं।

पुलिस FIR की कॉपी 24 घंटों के अंदर वेबसाइट पर डालें

पिछले ही साल 7 सितंबर को जस्टिस मिश्रा और जस्टिस सी नगाप्पन की बेंच ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया था कि एफआईआर की कॉपी 24 घंटे के भीतर अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दें। बता दें कि जस्टिस दीपक मिश्रा जब दिल्ली के चीफ जस्टिस थे तब 6 दिसंबर, 2010 को उन्होंने दिल्ली पुलिस को भी इसी तरह के आदेश जारी किए थे।

याकूब मेमन की फांसी

याकूब मेमन ने फांसी से ठीक पहले अपनी सजा पर रोक लगाने की याचिका डाली थी। मुंबई धमाकों (वर्ष 1993) में याकूब मेमन को दोषी ठहराया गया था। जुलाई 2013 की उस रात को अदालत खुली थी। सुबह 5 बजे जस्टिस मिश्र ने फैसला सुनाया, ‘फांसी के आदेश पर रोक लगाना न्याय की खिल्ली उड़ाना होगा। याचिका रद्द की जाती है।’

मायावती सरकार की प्रोन्नति में आरक्षण की नीति पर रोक

यूपी की मायावती सरकार द्वारा लागू की गई प्रमोशन में आरक्षण की नीति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। जिसे लेकर केस जब सुप्रीम कोर्ट में आया तो कोर्ट ने इसे रोक को कायम रखा। अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था। दो जजों की इस बेंच में जस्टिस दीपक मिश्रा भी शामिल थे।

आपराधिक मानहानि की संवैधानिकता बरकार

पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने आपराधिक मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता को बरकरार रखने का आदेश सुनाया था। इस बेंच में जस्टिस मिश्रा भी थे। यह निर्णय सुब्रमण्यन स्वामी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अन्य बनाम यूनियन के मामले में सुनाया गया था। खंडपीठ का कहना था कि अभिव्यक्ति का अधिकार असीमित नहीं है।

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