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सरकारी नौकरी में पूर्व सैनिकों को वरिष्ठता लाभ नहीं

पूर्व सैनिक

शिमला। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व सैनिकों को राहत की जगह झटका लगा है। कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि पूर्व सैनिकों को पदोन्नति व वित्तीय लाभ नहीं मिलेंगे। इस मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के साल 2008 के फैसले को ठीक करार देते हुए अदालत ने यह व्यवस्था दी।





कोर्ट ने यह फैसला पूर्व सैनिकों की दायर स्पेशल लीव पेटीशन पर सुनाया। हिमाचल प्रदेश के डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वकील राजीव कुमार बंसल ने कहा कि आपातकाल में देश को सेवाएं देने वाले पूर्व सैनिकों के पुनर्वास के लिए सरकार ने डिमॉब्लाइज्ड आम्र्ड फोर्सेज़ पर्सनल (रिजर्वेशन ऑफ वेकेंसीज) नॉन टेक्नीकल रूल्स 1972 के रूल 5.1 में प्रावधान रखा था कि पूर्व सैनिक का सेवाकाल भी राज्य सरकार की नौकरी में जोड़ा जाए जिससे उन्हें तमाम लाभ मिल सकें।

उनकी दलील थी कि किसी को भी पूर्व सैनिकों के पुनर्वास में आपत्ति नहीं हो सकती पर उन्हें सामान्य श्रेणी के लोगों से वरिष्ठ बनाना बड़ी विसंगति थी। इस फैसले का असर हिमाचल के शिक्षा विभाग में भी होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जिला न्यायवादी बनने के लिए 2 साल बतौर वकील अनुभव होना आवश्यक शर्त थी, लेकिन पूर्व सैनिकों को वरिष्ठता तब से मिलती थी जब उन्होंने कानून की डिग्री भी नहीं ली होती थी।

सरकार ने कदम बढ़ाकर खींचे थे हाल ही में धर्मशाला दौरे के दौरान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा था कि उनसे पूर्व सैनिकों ने आग्रह किया था कि प्रदेश मंत्रिमंडल द्वारा पूर्व सैनिकों के लाभ खत्म करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने तक लागू न करें। जिसके बाद कार्मिक विभाग ने अधिसूचना रोक दी थी।

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