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सशस्त्र सेनाओं में हर तीन दिन में एक आत्महत्या !

दिनेश तिवारी

दिनेश तिवारी (वरिष्ट पत्रकार)

रक्षा मंत्रालय का यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है कि सेना के तीनों अंगों में हर तीन दिन में एक सुरक्षाकर्मी किन्हीं विभिन्न कारणों से आत्महत्या कर लेता है। और अधिक परेशान करने वाला तथ्य यह है कि इस आंकड़े में सर्वाधिक संख्या इंडियन आर्मी (276 व्यक्ति) की है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी, 2014 से 31 मार्च, 2017 के दौरान 348 व्यक्तियों ने आत्महत्या की। निश्चय ही बेहद परेशान करने वाला यह तथ्य चिंताजनक है।





मौजूदा हालात में भारतीय सेना बाहरी दुश्मनों और देश के भीतर आतंकवाद से मुकाबला लंबे समय से बड़ी शिद्दत व मुस्तैदी से कर रही है। अस्त्र-शस्त्र, मशीन, औजार तो दूसरे पायदान पर होते हैं, सबसे पहले सैनिक का मनोबल होता है जो देश की सेवा, सीमा की सरहदों की हिफाजत के काम आता है। ऐसे में जब जवान या अधिकारी का मन बेहद दबाव, तनाव, खिंचाव से गुजर रहा हो तो उसका ड्यूटी कर पाना तो दूर, वह तमाम कारणों से स्वंय को असहाय समझ खुद को समाप्त करने की ओर उन्मुख हो जाता है। लिहाजा आत्महत्या जैसा कदम उठाकर सबसे ‘मुक्ति’ पा लेने की सोचता है।

निश्चय ही आज सेना के तीनों अंगों में कर्तव्य पालन पहले से अधिक चुनौती भरा काम है। ऊपर से घर-परिवार की जिम्मेदारी का बोझ भी व्यक्ति विशेष के हिस्से में होता ही है। साथ ही लंबे समय तक आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनाती, दुर्गम-दूरदराज इलाकों में रहकर ड्यूटी तथा घर-परिवार से दूरी किसी भी जवान के लिए मानसिक तथा शारीरिक परेशानी का सबब बनती है। इन सबके बीच तालमेल न बिठा पाने, खुद को बेबस समझ कर आत्महंतात्मक कदम उठाने की उनकी विवशता हो जाती है। इस प्रवृत्ति पर सेना, सरकार और समाज को चिंतन करने और तत्काल पहल करने की जरूरत है।

यह ठीक है कि सेनाएं अपने स्तर पर बेहद मानसिक दबाव से जूझ रहे सैन्य कर्मियों की मनोवैज्ञानिक काउंसिल करती हैं और उन्हें घर-परिवार की समस्याओं, जमीन विवाद, लंबी तैनाती से जुड़ी बातों से निपटने का हल सुझाती हैं जिससे फौरी तौर पर उन्हें राहत मिलती भी है। पर इतने से ही बात बनती नहीं है। इस प्रवृत्ति से सैनिकों को उबारने के लिए सशस्त्र सेनाओं को बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है। ट्रेनिंग के दौरान यदि उन्हें जिंदगी और सेना में ड्यूटी जैसी बातों का अधिक गहराई से विश्लेषण कर प्रशिक्षित किया जाए तो सैनिकों का मन उस दिशा की ओर चल पड़ेगा जिसमें वे समझेंगे कि व्यक्ति की मौजूदगी ही सर्वोपरि है और ‘कर्म’ ही उसका हथियार है। समाज को भी सोचना होगा कि सैनिक केवल सेना का नहीं, पूरे देश का होता है। सैनिक के घर-परिवार की समस्याओं, भूमि विवाद, शिक्षा, जवान के माता-पिता की देखभाल आदि, गांव, कस्बा, मुहल्ला के निवासी जिम्मेदारी भरे अहसास के साथ करने की मानसिकता बनाएं तो देश की हिफाजत का बीड़ा उठाए सैनिक की मानसिक परेशानी स्वतः ही खत्म हो जाएगी। पर ऐसी सोच हमें बनानी होगी और उस पर अमल करना होगा। तभी सैनिकों की आत्महत्या करने वाली मानसिकता में कमी आएगी।

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