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…इसलिए पूरे देश में केवल बक्सर जेल में बनता है फांसी का फंदा

फांसी का फंदा
फाइल फोटो

बक्सर। देश में आजादी के बाद अब तक जितनी फांसी दी गईं उनमें बक्सर जेल में बनी ‘मनीला रस्सी’ का इस्तेमाल हुआ। पूरे देश में केवल बक्सर केंद्रीय कारागार में ही फांसी का फंदा बनाया जाता है। गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे से लेकर मुंबई हमले के दोषी आतंकी आमीर अजमल कसाब और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को दी गई फांसियों में बक्सर जेल के फंदों का ही इस्तेमाल हुआ है।





निर्भया कांड के चारों दोषियों को आगामी 22 जनवरी को सुबह 07 बजे दी जाने वाली फांसी के फंदे इसी जेल के बने हुए हैं।

ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों ने सन् 1844 में बक्सर केंद्रीय करागार में मौत का फंदा तैयार करने की शुरुआत की थी। इससे पहले ये रस्सी फिलीपींस के मनीला जेल में बनती थी। इसलिए इसे मनीला रस्सी भी कहा जाता है। बक्सर जेल के सुप्रीटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा को मुताबिक इंडियन फैक्ट्री लॉ के हिसाब से बक्सर सेंट्रल जेल के छोड़ बाकी सभी दूसरी जगहों पर फांसी के फंदे बनाने पर प्रतिबंध है। पूरे भारत में फांसी का फंदा बनाने की मशीन केवल एक ही जगह यानी बक्सर जेल में लगाई गई है।

अरोड़ा कहते हैं कि रस्सी के लिए यहां की जलवायु अनुकूल है। बक्सर सेंट्रल जेल गंगा नदी के किनारे स्थित है। फांसी का फंदा बनाने वाली रस्सी बहुत मुलायम होती है। उसमें इस्तेमाल होने वाले सूत को अधिक नमी की जरूरत पड़ती है।

फांसी के फंदे बनाने के लिए बक्सर सेंट्रल जेल में कर्मचारियों के पद सर्जित हैं। वर्तमान में चार कर्मी इन पदों पर काम कर रहे हैं। ये कर्मचारी केवल ट्रेनिंग और दिशा निर्देश देते हैं। फंदे बनाने का काम जेल के कैदी करते हैं। यह काम यहां के कैदियों की परंपरा में शामिल हो गया है। फांसी का फंदा बनाने के लिए जिस सूत का इस्तेमाल होता है उसका नाम J34 है।

फंदा बनाने का काम हाथ से होता है। मशीन से केवल धागों को लपटने का काम होता है।154 सूत का एक लट बनाया जाता है। 06 लट बनाए जाते हैं। इन लटों से 7200 धागे या रेशे निकलते हैं। इन सभी धागों को मिलाकर 16 फीट रस्सी बनती है।

 

 

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