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स्पेशल रिपोर्ट: क्या अमेरिका चीन को दबा पाएगा ?

अमेरिका और चीन में ठनी
फाइल फोटो

ललितमोहन बंसल, लॉस एंजेल्स से

कोरोना महामारी के लिये चीन को जिम्मेदार ठहराने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन के खिलाफ किस हद तक जा सकते हैं। क्या अमेरिका ऐसा कर पाएगा। चुनाव की दहलीज़ पर बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी ठान ली है कि उनके रहते चीन से कारोबारी रिश्तों की कोई गुंजाइश नहीं है। हालाँकि वह ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ की गुहार लगाते हुए चीन पर दबाव बनाए हुए हैं। ऐसे में दो सवाल सामने है। एक, क्या अमेरिका कारोबारी जंग में चीन से आयातित 470 अरब डालर के वस्तु और सेवाओँ पर अतिरिक्त दस प्रतिशत सीमा शुल्क लगा सकेगा। दूसरा, ऐसा नहीं हो पाता है, तो क्या अमेरिकी कंपनियाँ और निवेशक चीन से नाता तोड़ पाएँगे? ट्रम्प की मजबूरी यह है कि मिड वेस्ट के एक दर्जन राज्यों में सोया और समुद्री जलजीवों के व्यापारी उनके रिपब्लिकन मतदाता हैं।





चीन में अमेरिकी कंपनियों का क़रीब 1.2 खरब डालर का निवेश है। इनमें से बड़ी कंपनियों-जैसे बोईंग, एपल और एच पी अथवा डेल टेल हार्डवेयर कंप्पयूटर हैं। इनकी विवशता यह है कि ये अपने उत्पादों के लिए सारे उपकरण ख़ुद नहीं बनाती। उनके भी आगे सहायक इंडस्ट्रीज हैं, कंट्रकटर, सब कंट्रक्टकटर हैं, जो एक उत्पाद निर्मित करने में सैकड़ों उत्पाद बनाते हैं। शिकागो स्थित ‘बोईंग’ सीईओ ने अभी कहा था कि उसे विमान के छोटे-छोटे कल पुर्ज़ों के लिए चीन में सहायक उद्योग ज़माने के लिए वर्षों लगे थे, अब वह आनन-फ़ानन में दुकान उठा कर पेरिस में बैठे प्रतिस्पर्धी एयर बस को लाभ का मौक़ा नहीं दे सकते। यही स्थिति एपल उत्पाद हों अथवा रिटेल में वाल मार्ट अथवा अमेजन की। वाल मार्ट के 86 प्रतिशत उत्पाद तो ‘मेड इन चीन’ हैं। फिर इन उत्पादों के लिए अमेरिकी कंपनियों ने वर्षों लगा कर मानव संसाधनों, कल-कारख़ानों और बैंक और पूँजी, पारदर्शी श्रमिक क़ानूनों, आवागमन के साधनों के लिए लंबा संघर्ष किया था। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद पहली पारी तो कुछ साँविधानिक विवशताओं के कारण और कुछ निवेशकों की बुनियादी समस्याओं के कारण निकल गई। अब उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश आदि में पारदर्शी श्रम नियमों तथा सिंगल विडों के तहत इकाइयों के आवेदनों पर आधार तैयार होने लगा है, तो निवेशक सहमें सहमें हैं। उन्हें लगता है कि नवंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व चीन से बिस्तर उठाने का आक्रामक क़दम उठाना उचित नहीं होगा, वह भी उस स्थिति में जबकि वह ट्रम्प के पुन: सत्तारूढ़ होने पर आश्वस्त नहीं हैं। ऐसे में, स्थितियाँ प्रतिकूल होती भी हैं तो उनके पास क्रमानुसार विएतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और फिर भारत का रास्ता खुला है। भारत में भले स्थिर सरकार के लिए उन्हें भरोसा दिलाया जा सकता है, बिजली के लिए अलग से ग्रिड, बैंक और सिंगल विंडो का भरोसा दिलाया जा सकता है, पर मानव संसाधनों को प्रशिक्षण किया जाना एक दुष्कर चुनौती है।

हमें यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका के लिए 97 % एंटी बायोतिक दवाओं की भरपाई चीन करता है, ‘एपल’ से नाता सहायक इंडस्ट्रीज के रूप में ही नहीं, आई फ़ोन उत्पादों का एक बड़ा क्रेता भी है। सिलिकन वैली में शानतुंग (चीन) के एक उद्यमी ने घर लौट कर इसी कोविड काल में ‘ज़ूम’ के बल पर काँफ्रेंसिंग से अमेरिका का मूँह बंद कर दिया है। फ़र्नीचर मार्केट का एक अंश भले विएतनाम चला गया, लेकिन प्रतिस्पर्धा के चलते यह मार्केट फिर चीन लौट आई। सिलिकन वैली के बहुचर्चित आर्टीफ़िशियल इंटेलीजेंस में काई फ़ू ली सुपर पावर है, मोबाइल में ‘फ़ाइव जी’ का दुनिया में बोलबाला है, अली बाबा अथवा मेटुआन नेटवर्क एक नाम है, डेढ़ खरब डालर की ग्रीन टेक्नोलाजी में दुनिया में नेतृत्व है। ग्लोबल डाटा एनालिटिक्स फ़र्म की माने तो इसी महामारी में चीन ने क़रीब 15 अरब डालर के समझौते किए हैं, निर्यात पर अवलंबित चीनी कंपनियों को अमेरिका से भले भरपूर सहयोग न मिले, ढाई खरब डालर की घरेलू खपत से कौन इनकार कर सकता है। फिर अप्रैल, 2020 में ही उसके आयात में 14.2 % की कमी आइ तो निर्यात में फिर भी उसने पिछले वर्ष की तुलना में 3.5 % अधिक वृद्धि कर ली, हालाँकि उसे मेडिकल उत्पादों में निर्यात का लाभ मिला।

इस महामारी में WHO के कथित सहयोग से चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग का ग्राफ़ भले गिरा है, इसके बावजूद वह एक सपना ले कर चले हैं कि 2025 तक विश्व व्यापार पर हावी हो जाएं।

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