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स्पेशल रिपोर्ट: अमेरिकी चुनाव में प्रवासी भारतीय वोटरों पर निगाहें क्यों ?

अमेरिकी चुनाव में प्रवासी भारतीय
फोटो सौजन्य- गूगल

ललित मोहन बंसल, लॉस एंजेल्स से…

इस एक सवाल ने एक सामान्य अमेरिकी की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस  चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दूसरी पारी के लिए व्हाइट हाउस में चार साल के लिए पुन: सत्तारूढ़ हो पाते हैं अथवा नहीं, इस पर चीन, ईरान और रूस की निगाहें तो लगी ही है, अमेरिका के रूढ़िवादी और अमेरिकी इवेंजिलिस्ट की पुरज़ोर कोशिश है कि ट्रम्प को एक ओर मौक़ा मिले। इसके विपरीत चीन और ईरान से संबंध सुधारने के लिए ‘आतुर’ डेमोक्रेट जोई बाइडन-कमला हैरिस को पद पर आसीन करने के लिए वाममार्गी, बर्नी सैंडर्स और उनकी युवा जमात में ख़ासा जोश-खरोश है। चीन, ईरान और रूस के हैकर्स भी अमेरिकी चुनाव तंत्र और दोनों उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को प्रभावित करने में जुटे हैं। अमेरिकी मीडिया विभाजित है।





प्रवासी भारतीय मतदाता उलटफेर की स्थिति में हैं – कुल 15 करोड़ संभावित मतदाताओं में डाक-मत पत्रों के ज़रिए प्रारंभिक मतदान, शनिवार तक क़रीब छह करोड़ लोग मतदान कर चुके थे। o3 नवंबर को मतदान है। अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव प्रणाली में जो उम्मीदवार 539 सदस्यीय निर्वाचक मंडल में 270 मत हासिल कर लेगा, वही सिकंदर होगा। संविधान के अनुसार हारजीत में पापुलर मतों का कोई औचित्य नहीं है। अभी तक के पोल सर्वे में डेमोक्रेट जोई बाइडन-कमला हैरिस की जोड़ी काँटे की टक्कर वाले राज्यों फ़्लोरिडा, जार्जिया, मिशिगन, अरिज़ोना, पेंसेलवेनिया, विसकोनसिन, नार्थ कैरोलाइना आदि में 07 से 11 प्रतिशत अंक आगे है। इस में प्रवासी भारतीय समुदाय और भारतीय डायसपोरा (आपी) की माने तो काँटे की टक्कर वाले इन राज्यों में बसे बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय एकमुश्त मतदान करें तो हारजीत में उलटफेर संभव है। सच यह कि यह एक मिथ्या धारणा है। ह्यूस्टन में होडी-मोदी और अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रम्प’ से बने रिश्तों का ट्रम्प परिवार ने कुछ रैलियों में लाभ उठाने की कोशिश की है, इसका उन्हें लाभ मिला है पर उदारवादी मीडिया सर्वे में 65 प्रतिशत प्रवासी भारतीयों का झुकाव जोई बाइडन की ओर बताया जाता है।  रिपब्लिकन का दावा है कि ये पोल सर्वे तो पिछले चुनाव में डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में भी थे।

भारत को अमेरिका की नहीं, अमेरिका को भारत की ज़रूरत है- अमेरिकी संविधान और क़ानून में पैंठ रखने वाले प्रो॰ वेदप्रकाश नंदा ने रविवार को एक वर्चुएल संबोधन में कहा कि भू राजनैतिक स्थितियाँ ऐसी बन रही है कि अब भारत को अमेरिका की नहीं, अमेरिका को भारत की ज़रूरत है। सच यह है कि एक अरब से अधिक आबादी वाला देश भारत, अब नया भारत है, जो तेज़ी से एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प अथवा डेमोक्रेट जोई बाइडन, दोनों ही भारत से ट्रेड, सामरिक और कूटनीति में बेहतर रिश्ते बनाने के लिए क़ायल हैं, सिवा इसके कि जोई बाइडन पिछले महीनों में चुनाव प्रचार से पूर्व मोदी सरकार की कश्मीर नीति और मानवाधिकार मुद्दे पर ‘अवांछित बयानबाज़ी’ कर चुके हैं। बाइडन का यह कथन प्रवासी भारतीय समुदाय में एक विशेष वर्ग के गले नहीं उतर रहा है। लेकिन यह भी तो उतना ही सच है, दस-बारह वर्ष से ग्रीन कार्ड की पंक्ति में बैठे एच 1-बी वीज़ा पर आठ लाख भारतीय आई टी पेशेवर, एच-4 वीज़ा पर एक लाख स्पाउस-महिलाएँ ट्रम्प नहीं, बाइडन-कमला हैरिस की ओर निहार रहे हैं। ये बड़े और निजी मामले हैं, जो प्रवासी भारतीयों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। अमेरिका में 41  लाख प्रवासी भारतीय समुदाय में 18 लाख मतदाता हैं।

 ट्रम्प ने फिर खेला है राष्ट्रवाद का कार्ड- राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ का मंत्र फूँका है। अपने रूढ़िवादी अमेरिकी ‘इवेंजिलिकल’ मतों को एकजुट करने के लिए ‘ट्रम्प कार्ड’ चला है, तो प्रतिपक्ष के नेता जोई बाइडन को कट्टरपंथी समाजवादी रंग में रंगने की कोशिश की है। ये इवेंजिलिकल मूल अमेरिकी ईसाई है, जो एकमुश्त 82-87 % ट्रम्प के साथ बताए जाते हैं, इनमें यहूदी और पुराने ब्रिटिश इवेंजिलिकल और रोमन कैथोलिक (11 % ) हैं, जो ट्रम्प नीतियों में अंध विश्वास रखत हैं। बस, ट्रम्प अपने बड़बोलेपन से मार खा रहे हैं। फिर भी पिछले महीने ट्रम्प ने सुप्रीम कोर्ट की एक वयोवृद्ध न्यायमूर्ति रूथ बद्र गिंग्सबर्ग की मृत्यु के तुरंत बाद जिस तरह एक रूढ़िवादी एमी कूनी बैरेट को नामित कर  ट्रम्प कार्ड खेला है, इवेंजिलिकल समुदाय में जान लौट आई है। डेमोक्रेट बावेला खड़ा कर रहे हैं, पर ट्रम्प कहते हैं: ‘’में संविधान की मर्यादा के अनुसार चार साल के लिए राष्ट्रपति चुना गया हूँ। ट्रम्प इस से पूर्व अपने कार्यकाल में न्यायमूर्ति नील एम॰ गोर्सुख और न्यायमूर्ति ब्रेट एम॰ कावनाह को मनोनीत  कर रिपब्लिकन बहुल सीनेट से पुष्टि करवा चुके हैं। इस से नौ सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट में रिपब्लिकन समर्थित छह न्यायमूर्ति हो गए हैं। यह एक बड़ी बात है।

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