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Special Report: संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व पर सवाल 

संयुक्त राष्ट्र
फाइल फोटो

ललित मोहन बंसल न्यू यार्क से…

सयुक्त राष्ट्र मूल उदेश्य हासिल करने में विफल रहा है? इसकी गूँज इन दिनों संयुक्त राष्ट्र के गलियारे में सुनी जा रही है। 75 सालों में भले ही हम तीसरे विश्व युद्ध  की दहलीज़ तक नहीं पहुँचे हैं। एक ओर अमेरिका और दूसरी ओर चीन, एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहा रहे हैं। एक सप्ताह तक चलने वाले संयुक्त राष्ट्र सत्र के दूसरे दिन मेज़बान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफ़िंग के वीडियो रिकार्डेड भाषणों की ‘गंध’ से विभाजन की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, उसे देख सुन कर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरस ख़ुद इसके अस्तित्व को लेकर चिंतित हो उठे हैं। अमेरिका धन राशि के सहयोग और संयुक्त राष्ट्र की इकाइयों से हाथ खींचता जा रहा है, तो चीन उन इकाइयों को क़ब्ज़ाए जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध की राख के ढेर पर विजेता देशों ने पारस्परिक सहयोग से संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए कामनाएँ की थीं, उन्हें निराशा होने लगी है। जापान तो उभर गया और विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक ताक़त भी बन गया है, लेकिन वैश्विक संगठन अब दो गुटों-अमेरिका और चीन में बँटने की राह पर है। यह नज़ारा विश्व नेताओं के उद्बोधन के पहले ही दिन सामने आ गया।  ट्रम्प के साथ-साथ ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेयर बोलसानारो  ने  जम कर सवाल उठाए  तो  ईरान के राष्ट्र पति हसन रूहानी ने आर्थिक प्रतिबंधों के नाम पर अमेरिका पर तीखे प्रहार किए।





गुतेरस हताश हैं: संयुक्त राष्ट्र महासचिव अँटोनियो गुतेरस ने मंगलवार को बड़े ही दुखी मन से कहा कि ‘दुनिया हम से बहुत उम्मीदें लगाए बैठी है। एक नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली पर सहयोग के बावजूद बहुपक्षवाद की प्रकृति बदल रही है। इक्कीसवीं सदी के लिए अधिकाधिक नेटवर्क और समावेशी बहुपक्षवाद की ज़रूरत है।’ उन्होंने आशा जताई, ‘संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों, देशों के प्रमुख समूहों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच पारस्परिक विश्वास और सामंजस्य को मजबूत किए जाने की बड़ी ज़रूरत है। एक ओर कोरोना महामारी से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, तो सतत विकास के लिए सन 2021 वर्ष एकता और एकजुटता के लिए बाहें पसारे खड़ा है।’

अमेरिका फ़र्स्ट तथा चीन की दादागिरी:  सीरिया, यमन और लीबिया में युद्ध की स्थिति बनी हुई है, तो इज़राइल और फ़िलिस्तीन का संकट ज्यों का त्यों है, भले ही ट्रम्प ने मध्यपूर्व एशिया में अरब देशों-संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन को इज़राइल के समीप लाने की कोशिश की है। भारत सहित अनेक विकासशील देशों ने अंतरराष्ट्रीय आपदाओं के दौर में अपने-अपने सामर्थ्य के बल पर सैन्य बल एवं ज़रूरी चिकित्सीय तथा खाद्य ज़रूरतें मुहैया कराई है। इसके बावजूद अमेरिका फ़र्स्ट और चीन की ओर से संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों को धत्ता बताना और इन एजेंसियों के क़ायदे क़ानून का पालन करने में आनाकानी करना उनकी हठधर्मिता प्रदर्शित करती है। दक्षिण चीन सागर मामले में चीन ने अन्तर्राष्ट्रीय कोर्ट के आदेशों को मानने से इंकार किया है, तो संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के बावजूद अपने पश्चिमी प्रांत शिनच्यांग  में उईगर मुस्लिम समुदाय के प्रति बर्बरतापूर्ण व्यवहार करने से बाज़ नहीं आ रहा है। रोहिंग्या का मामला हो अथवा पाकिस्तान में आतंकवाद को प्रश्रय दिए जाने और सीमापार आतंकवाद का मामला हो, चीन आँखें मूँदे अपने चहेते पाकिस्तान का साथ देने को विवश है।

चुनौतियाँ : संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में शरणार्थियों की संख्या पहले से दोग़ुना हुई है, दुनिया में ख़ासतौर से अफ़्रीका, एशिया और लेटिन अमेरिका में भुखमरी से 26 करोड़ 50 लाख लोग बिलबिला रहे हैं। कोरोना महामारी से लड़ने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सम्मुख दस अरब डालर एकत्र करने की ज़िम्मीदारी है, तो बड़ी मुश्किल से एक चौथाई अंश ही एकत्र हो पाया है। सन  2030 तक पूर्ण साक्षरता, अमीर-ग़रीब में बढ़ती खाई को कम करने, लिंग भेद को समाप्त किए जाने जैसे मुद्दे चुनौतीपूर्ण हैं। सीरियाई शरणार्थी समस्या पर अंकुश नहीं लग पा रहा है तो म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के नरसंहार की गाथाएँ मीडिया की सुर्ख़ियाँ बटोर कर रह गई हैं। वेनेज़ुएला में लाखों बच्चे कुपोषण के शिकार है। ये चुनौतियाँ गंभीर हैं।

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