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Special Report: अमेरिका की भारत-चीन सैन्य तनातनी पर है नजर

ऱाष्ट्रपति ट्रंप
फ़ाइल फोटो

लास एंजेल्स से ललित मोहन बंसल..

अमेरिका ने संकेत दिये हैं कि वह भारत चीन युद्ध की स्थिति में भारत का न केवल  नैतिक समर्थन देगा बल्कि सैनिक मदद भी देने को तैयार है और  इस इरादे से उसने यूरोप से अपनी सेना में कटौती कर प्रशांत इलाके में भेजने की तैयारी कर ली है।





 गौरतलब है कि अमेरिका ने लद्दाख में भारतीय पक्ष को सराहा है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के उकसाने की कार्रवाई की निंदा की है। उसने कड़े शब्दों में यह संदेश दिया है कि वह जर्मनी से आधी अर्थात पच्चीस हज़ार सैनिकों को हटा कर पी एल ए की आए दिन बढ़ती जा रही धमकियों का मुँह तोड़ जवाब में मित्र देशों–भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया और फ़िलिपींस की मदद में तैनात करने पर विचार कर रहा है। विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने कहा भी है कि चीन सीमाओं पर अपनी सेना को उकसाता है। वह खल नायक है। साथ ही, पोंपियो ने यह भी कहा है कि अमेरिकी सेनाओं की तैनाती के लिए सम्बद्ध देशों से बातचीत के बाद ही अमेरिकी सेनाओं की तैनाती की जाएगी।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री बोरिस जोनसन ने भी भारत और चीन से सीधी बातचीत की अपील की है।

चीन ने छल और कपट की राजनीति से ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के नाम पर दक्षिण एशिया में श्री लंका, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्ला देश और नेपाल में बुनियादी ढाँचे के नाम पर अरबों डालर निवेश किए। हुआ क्या, श्री लंका को ऋण नहीं चुकाने पर हिंद महासागर में हमबनटोटा पोर्ट ही गँवाना पड़ा। इस पर पड़ौसी देश सतर्क हुए हैं। दक्षिण चीन सागर में अकूत धरोहर हड़पने और अंतराष्ट्रीय जल मार्ग पर आधिपत्य ज़माने के लिए वह आसियान देशों को क्यों लतिया रहा है? यह औछी रणनीति का हिस्सा है। इस से ये सभी देश क्रुद्ध हैं। इस से निपटने के लिए अमेरिकी और चीनी युद्धपोत आमने-सामने डटे हैं। खाड़ी में तेल उत्पादक देशों ‘ओपेक’ में बेताज अग्रणी सऊदी अरब से गहरी पैंठ रखने वाले रूस और अमेरिका दोनों ही कच्चे तेल की राजनीति में चीन के निरर्थक हस्तक्षेप से वाक़िफ़ हैं। इस के बावजूद देखिए, ट्रम्प को ग्रुप सात देशों के समूह में मोदी को न्योता देना पड़ा है? आज आप और हम जानते हैं, चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखते हुए दक्षिण एशिया में भारत ही एक मात्र देश है, जो क्षेत्रीय संतुलन के लिए अपरिहार्य बना है। अमेरिका के साथ सामरिक रिश्ते बनाने और नाटो के मित्र देशों में आस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया के बराबर का दर्जा दिए जाने के बावजूद भारत के रूस से सात दशकों के सामरिक और मिलिट्री संबंधों का क़ायम रखना मोदी कूटनीति एवं दौत्य सम्बन्धों की अनूठी मिसाल है।

रूस भी चीन की ढाई चाल बढ़ने की नीति से वाक़िफ़ है: ऊष्ण-शीत रणनीति में माहिर रूस के  राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन चीन की ढाई चाल चलने और फिर एक क़दम पीछे हटने की नीति से वाक़िफ़ हैं। अमेरिका और रूस के बीच दशकों पुराने शीत युद्ध के बावजूद पुतिन की रणनीति से ट्रम्प अनभिज्ञ नहीं हैं। दोनों एक दूसरे को मित्र कहते हैं। ये अपने-अपने मित्र देशों की मदद के लिए साथ खड़े ही नहीं होते, लेकिन तलवारें भी नहीं भांजते। चाहे वह, ईरान के विरूद्ध अमेरिका की ओर से आणविक नीति तोड़ने का मामला हो अथवा वेनेज़ुएला में अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से उनके राष्ट्रपति को हटाए जाने का संकट खड़ा हो गया हो। पुतिन ‘चाणक्य नीति’ अपनाने में कभी गुरेज़ नहीं करते। रूस के लिए व्लादिमिर पुतिन अजेय हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ की आड़ में वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टी का चीन में सात दशक से एक छत्र राज है। इसी कम्युनिस्ट पार्टी ने संविधान को ताक पर रखते हुए पुतिन की राह पर महत्वाकांक्षी शी चिन  फिंग को ‘असीमित’ कार्यावधि के लिए शासनारूढ़ किया था। शी की दो कार्यावधि बीत रही है। पार्टी और शी, दोनों की छटपटाहत उभर रही है। शी के पास अब ज़्यादा समय नहीं है। वह अमेरिकी थाली में मलाई चाटते-चाटते एक ओर अमेरिका को आँखे दिखा रहे हैं, तो दूसरी ओर नंबर वन बनने के लिए अपनी शर्तों पर रूस से हाथ मिला रहे हैं। चीनी विस्तारवादी रण- नीति से रूस अनभिज्ञ नहीं है। भू-राजनीति में रणनीति में माहिर पुतिन ने दिखा दिया है कि वह अंगुली पकड़ कर नहीं, अंगुली पकड़ा कर  शी चिन फिंग को साथ तो ले सकते हैं। अभी हाल ही में द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी पर जीत की  75 वीं वर्ष गाँठ के अवसर पर रूस ने भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को आमंत्रित किया। इस दौरान  गलवान घाटी में हिंसक झड़प में भारत के बीस जवानों की शहादत पर कड़े तेवर और चीनी रक्षा मंत्री से मिलने से राजनाथ सिंह का  इनकार करने फ़ैसले को देखा जाना है। इस पर रूस के उप प्रधान मंत्री यूरी बोरिसोव ने चीनी  रक्षा मंत्री को अपने कड़े तेवर से यह समझाने की कोशिश की है कि वह उन्हें अंगुली पकड़ा कर चलने की सीख नहीं दें, बल्कि क्षेत्र में शांति और स्थायित्व के लिए सीमा विवादों पर भारत से सीधे बातचीत करें।

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