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समर नीति: मालाबार नौसैनिक गठजोड़ बनेगा ?

मालाबार नौसैन्य अभ्यास

चार देशों के मालाबार साझा नौसैनिक युद्धाभ्यास का दूसरा चरण अरब सागर में 16 से 20 नवम्बर तक चला और विश्व के सामरिक जगत में नई हलचल पैदा कर गया। सामरिक हलकों में मालाबार के इस चर्तुपक्षीय आयोजन से कयास लगने शुरू हो गए हैं कि समुद्र में पैदा हलचल सामरिक दुनिया में भी नये समीकरण को जन्म देगी या मालाबार केवल सालाना नौसैनिक मेलजोल तक ही सीमित रहेगा।





इस बार के 24वें साझा मालाबार नौसैनिक अभ्यास की खासियत यह थी कि इसमें आस्ट्रेलिया ने भी भाग लिया था जिसने 2007 में चीनी फटकार के बाद मालाबार से अपनी साझेदारी वापस ले ली थी। लेकिन चीन की विस्तारवादी नीतियों से दुनिया के छोटे बडे देश इस तरह परेशान हैं कि अब वे चीन की बंदरघुडकी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। पिछली बार 2007 में मालाबार साझा नौसैनिक अभ्यास में पांच देशों- आस्ट्रेलिया, जापान, सिंगापुर , भारत और अमेरिका ने अपने युद्धपोत भेजे थे। लेकिन चीन ने पांच देशों के इस नौसैनिक युद्ध खेल पर कडा बयान जारी किया और सभी देशों से विरोध जाहिर किया तो आस्ट्रेलिया डर गया। इसके बाद से मालाबार साझा युद्धाभ्यास फिर दिवपक्षीय स्तर पर भारत औऱ अमेरिका के बीच ही सीमित कर दिया गया। सबसे पहले 1992 में भारत और अमेरिका ने मालाबार साझा अभ्यास की शुरुआत द्विपक्षीय स्तर पर की थी लेकिन इसमें 1998 के भारतीय परमाणु परीक्षण की वजह से दो साल के लिये व्यवधान पड गया। 2015 में मालाबार अभ्यास में जापान को भी आमंत्रित किया जाने लगा और इस तरह यह अभ्यास त्रिपक्षीय हो गया। मालाबार अभ्यास एक बार हिंद महासागर में और एक बार जापान के नजदीकी समुद्री प्रशांत सागर के इलाके में आयोजित किया जाने लगा। चीन के समुद्री इलाके के नजदीक ही भारत, अमेरिका औऱ जापान द्वारा त्रिपक्षीय मालाबार अभ्यास के आयोजन से चीन काफी चिढा लेकिन विरोध जाहिर करने के अलावा वह कुछ कर नहीं सका।

अब चीन के लिये चिंता की बात यही है कि इस अभ्यास में आस्ट्रेलिया फिर शामिल हो गया है। इस तरह मालाबार में भाग लेने वाले चार देशों के नवगठित समूह क्वाड्रीलेटरल अलायंस यानी चर्तुपक्षीय गुट के सदस्य ही हैं इसलिये सामरिक हलकों में टिप्पणी की जाने लगी है कि यह मालाबार गुट क्वाड गुट का सैनिक विस्तार है। चीन ने तो इसे एशियाई नाटो की संज्ञा दी है 2007 में चीन की धमकी के आगे आस्ट्रेलिया इसलिये डर गया कि आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक चीन से जुडी थी। आज भी आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था चीन को होने वाले कई निर्यातों पर निर्भऱ है औऱ चीन ने इस बार भी आस्ट्रेलिया से अपनी नाराजगी दिखाने के लिये आस्ट्रेलिया से कोयला औऱ अन्य कच्चा माल से भरे व्यापारिक पोतों को चीनी बंदरगाहों के बाहर ही रोककर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है औऱ आस्ट्रेलिया को अप्रत्यक्ष संदेश दिया है कि चीन के खिलाफ बोलने की कीमत उसे अदा करनी होगी।

लेकिन मालाबार नौसैनिक गठजोड इस तरह की साझा गतिविधियां चीन के समुद्री आंगन में करने की हिम्मत करेगा या नहीं यह काफी कुछ अमेरिका के भावी राष्ट्रपति जो बाइडन के चीन के प्रति सामरिक नजरिये पर निर्भर करेगा। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान जो बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग को ठग कहा औऱ चीन के खिलाफ जम कर बोला लेकिन सत्ता सम्भालने के बाद भी वह चीन के खिलाफ वही रुख अरनाएंगे इसमें संदेह है। सामरिक पर्यवेक्षक कयास लगा रहे हैं कि क्या अमेरिका के भावी राष्ट्रपति जो बाइडन चीन विरोध को केवल अमेरिकी हितों को बचाने तक ही सीमित रखेंगे या फिर क्वाड या मालाबार के साझेदार देशों की आर्थिक और सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिये मिल कर काम करने की समर नीति पर चलेंगे। हालांकि अमेरिका के भावी राष्ट्रपति जो बाइडन की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 18 नवम्बर को पहली टेलीफोन वार्ता में हिंद प्रशांत इलाके पर चर्चा हुई है लेकिन माना जा रहा है कि मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन विरोध को जिस मुकाम पर पहुंचाया वहां से बाइडन नीचे उतरने की कोशिश करेंगे ताकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सम्भाला जा सके। चीन ने जिस तरह जापान को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है उससे माना जा रहा है कि चीन मालाबार और चर्तुपक्षीय गुट क्वाड में दरार पैदा करने की रणनीति पर चलेगा। मालाबार को प्रभावी सैन्य गठजोड़ बनाने के लिये चारों देशों में एकजुटता कागजी ही रहेगी या चारों देश कोई ठोस कदम उठाएंगे इस पर अभी कयास ही लगाए जा सकते हैं।

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