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सैन्य ठिकानों को बनाना होगा चुस्त और दुरुस्त 

भारतीय सेना शिविर

यह अत्यंत चिंताजनक है कि सेना के ठिकाने लगातार आतंकवादियों के निशाने पर हैं। और आतंकवादी हर बार एक दुस्साहस भरी रणनीति बनाकर आर्मी कैंप व संबंधित परिसरों में घुसकर अपने मंसूबों को कामयाब बनाने की जुगत करते हैं। जम्मू के सुंजवां आर्मी कैंप और श्रीनगर में CRPF शिविर पर आतंकी हमला इस बात का ताजा उदाहरण है कि इन कैंपों की सुरक्षा को चाक चौबंद करने में कहीं चूक हुई है। यह अफसोस की बात तो है ही, इस मामले में तत्काल ठोस कदम उठाने की भी है।





जम्मू के सुंजवां सेना शिविर पर निशाना कोई पहली बार नहीं साधा गया है। जून 2003 में भी दो फिदायीन सुंजवां कैंप में घुस आए थे जिसमें 12 सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले के मोहरा आर्मी कैंप (2014), जम्मू-पठानकोट हाइवे स्थित आर्मी कैंप (2015) के हमले भी परेशानी पैदा करने वाले थे। सबसे भयानक हमला बारामूला जिले के उड़ी में हुआ था। 18 सितंबर 2016 के इस आत्मघाती हमले में 19 सैनिक शहीद हुए थे और जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के चारों फिदायीन मारे गए थे। ये सभी हमले उस समय भी इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि आतंकवादी असुरक्षित कैंपों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि आखिरकार ऐसे हमलों को कारगर ढंग से सामना करने के लिए कोई पुख्ता पहल क्यों नहीं की जा रही जबकि आज भी चुनौतियां पूरी तरह से सामने हैं।

दरअसल जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमले के बाद आर्मी के वाइसचीफ लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) फिलिप कैंपोज की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी जिसने सुझाव दिया था कि सेना के कैंपों को अभेद्य बनाया जाए। दीवारें ऊंची हों, उनमें कंटीले तार लगें। उन्हें अलार्म सिस्टम और सीसीटीवी कैमरे से लैस किया जाए। समिति ने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ाने के कदम उठाने की बात साफ-साफ कही थी। इसमें बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा भी तैयार करना शामिल था। अगर इन दो वर्षों में कैंपोज कमेटी रिपोर्ट पर अक्षरशः काम हुआ होता तो सेना के ठिकानों पर हुए हमलों में इतना नुकसान नहीं हुआ होता। इस बीच यह राहतभरी खबर है कि केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर समेत देशभर के फौजी ठिकानों के लिए 1,487 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए इस दिशा में तत्काल तेजी आएगी।

जरूरत इस बात की है कि सैन्य शिविर और सशस्त्र बलों के ठिकानों को हर तरह से सुरक्षित किया जाए। कैंपोज कमेटी की सिफारिशें और धन का आवंटन इस बात की पुष्टि करता है कि इस रास्ते में अब कोई बाधा नहीं आएगी।

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