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स्पेशल रिपोर्ट: भारत ने की थी नेपाल से वार्ता की पेशकश

भारत और नेपाल का झंडा
फाइल फोटो

नई दिल्ली। नेपाल द्वारा उत्तराखंड के कुछ इलाकों को अपना भूभाग बताने और इस बारे में नेपाल का संशोधित मानचित्र जारी करने को लेकर यहां विश्वस्त सूत्रों ने नेपाल का एकतरफा कदम बताया है। यहां सूत्रों ने नेपाल द्वारा इस मसले पर बातचीत की पेशकश पर भारत द्वारा कोई जवाब नहीं दिये जाने के बारे में सूत्रों ने कहा कि नेपाल सरकार द्वारा भारतीय भूभाग को अपना बताने वाला संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश करने के पहले भारत ने नेपाल सरकार को बातचीत का प्रस्ताव भेजा था लेकिन नेपाल की ओर से इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया गया।





सूत्रों ने कहा कि भारत हमेशा से इस मसले पर नेपाल सरकार के साथ बातचीत करता रहा है और इस बारे में बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था। नेपाल सरकार ने खुद ही कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख के इलाके को लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों की समीक्षा करने के लिये एक कमेटी बनाने की बात कही थी लेकिन अचानक नेपाल की घरेलू राजनीति की वजह से नेपाल सरकार ने भारतीय भूभाग को अपना बताने का एकपक्षीय कदम उठा लिया।

यहां सूत्रों ने कहा कि नेपाल का दावा किसी ऐतिहासिक प्रमाण पर आधारित नहीं है। 1816 की नेपाल और ब्रिटिश भारत संधि का जिक्र करते हुए सूत्र ने कहा कि तत्कालीन नेपाल सरकार ने एक साल बाद कालापानी नदी के पूर्व में चार गांवों को अपना होने का दावा किया था जिसमें से दो गांवों को नेपाल को दे गिया गया और बाकी दो गांव नाबी और कुंथी को भारतीय इलाका ही बताया गया। नेपाल का दावा 1817 के दावों के विपरीत है। नेपाल का ताजा दावा दो सौ साल पहले हुई संधि के विपरीत है।

सूत्रों ने कहा कि नेपाल के साथ 98 प्रतिशत सीमा तय हो चुकी है और बाकी दो प्रतिशत के बारे में भारत ने हमेशा बातचीत करने पर जोर दिया. है। नेपाल का संशोधित मानचित्र ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। नेपाल के ताजा कदम ने कई लोगों को हैरान किया है। नेपाल घरेलू राजनीति की वजह से इस मसले का राजनीतिकरण कर रहा है।

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