DEFENCE

पुरानी तकनीक पर चल रही हैं ऑर्डनेंस फैक्टरियां !

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री

नई दिल्ली। भारत के उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल सरत चंद ने हाल में कहा था कि भारतीय ऑर्डनेंस फैक्टरियों का काम कत्तई संतोषजनक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे बेहतर औद्योगिक आधार पाकिस्तान के पास है। पाकिस्तान अपने कई उत्पादों का निर्यात तक करता है। उनके इस बयान के बाद भारत में इस विषय को लेकर बहस चल पड़ी है। अंग्रेजी अख़बार स्टेट्समैन में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि उप सेनाध्यक्ष की बात सच है।





भारत में ऑर्डनेंस फैक्टरियाँ ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (OFB) के तहत काम करती हैं, जो रक्षा मंत्रालय के अधीन है। देश में 40 से ज्यादा ऑर्डनेंस फैक्टरी हैं। इनमें से 18 स्वतंत्रता के पहले की हैं बाकी उसके बाद खोली गईं हैं। इनमें बंदूकों से लेकर गोला-बारूद, कपड़े, टैंक, वाहन, बूट और पैराशूट तक बनते हैं। इनकी कीमतें काफी ज्यादा होती हैं, क्योंकि इनके ऊपरी खर्चे बहुत ज्यादा हैं।

ऑर्डनेंस फैक्टरियों से होती है सेना की जरूरतों की खरीददारी

देश के उद्योगों में नई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, पर ऑर्डनेंस फैक्टरियाँ पुरानी तकनीक पर चल रहीं हैं। सरकार स्वदेशी उद्योग बढ़ावा देने की बात कहती है, पर सेना की जरूरतों की ज्यादातर खरीद इन ऑर्डनेंस फैक्टरियों से ही होती है। जबकि उनसे बेहतर और सस्ता माल खुले बाजार में उपलब्ध है।

प्रतियोगिता नहीं होने और इनके आधुनिकीकरण पर पैसा नहीं लगने के कारण इनकी दशा खराब होती जा रही है। अकसर गोला-बारूद की दुर्घटनाएं इसका उदाहरण हैं। सन 2009-10 में देवलाली में हुए एक एक्सीडेंट में एक ट्रेनी अफसर की मौत हो गई। वहाँ आर्टिलरी फ्यूजों की जाँच के लिए एक विशेष एक्सरे मशीन लगाई गई तो पता लगा कि भारी संख्या में फ्यूज़ खराब थे। न जाने ऐसे कितने फ्यूज़ युद्ध के समय इस्तेमाल होते हैं ?

एम्युनिशन डिपो में विस्फोट में 20 की गई थी जान

पिछले साल पुलगाँव के एम्युनिशन डिपो में हुए विस्फोट में 20 लोगों की जान गई, जिनमें दो अफसर भी थे, जिनकी जान इसलिए गई क्योंकि वे आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे। नागपुर के निकट अम्बझारी की एम्युनिशन फैक्टरी से ‘एंटी टैंक माइंस’ बनकर आती हैं। पुलगाँव में इन माइंस को लाने पर पता लगा कि वे लीक कर रहीं हैं। इन्हें अलग कर दिया गया और फैक्टरी से कहा गया कि खराब विस्फोटकों को ले जाओ और नष्ट कर दो। पर फैक्टरी ने अनसुनी कर दी। यह रवैया इन फैक्टरियों में पाया जाता है।

जबलपुर की वेहिकल फैक्टरी में अशोक लेलैंड के बेंगलुरु के पास होसूर प्लांट में बने स्टैलियन वाहनों को नॉक्ड डाउन कंडीशन में लाया जाता है और उन्हें असेंबल किया जाता है। इससे लागत बढ़ती है। पर चूंकि इस फैक्टरी को चलाना है, इसलिए यह चल रहा है।

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