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नौसेना को मिली तीसरी स्कॉर्पीन INS करंज, 50 दिनों तक समुद्र में रहने में सक्षम

आईएनएस करंज
फाइल फोटो

नई दिल्ली। भारतीय नौसेना के बेड़े में स्कॉर्पीन श्रेणी की तीसरी पनडुब्बी को शामिल किया गया है। अब जल्द ही इसे औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। मुंबई में इसे INS करंज के नाम से नौसेना को सुपुर्द किया गया। बता दें सरकार की ‘मेक-​​इन-इंडिया’ प्रतिबद्धता को मजबूत करने की दिशा में इसे अहम कदम माना जा रहा है।





गौरतलब हो भारतीय युद्धपोत निर्माता कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने परियोजना पी-75 की तीसरी स्कॉर्पीन पनडुब्बी ​​आईएनएस करंज भारतीय नौसेना को सौंपी है। इस पनडुब्बी को जल्द ही भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। साल 2022 तक सभी 06 पनडुब्बियां नौसेना को सौंप दी जाएंगी। आईएनएस करंज में सतह और पानी के अंदर से टॉरपीडो और ट्यूब लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल दागने की क्षमता है। यह सटीक निशाना लगाकर दुश्मन की स्थिति बिगाड़ कर सकती है।

50 दिनों तक समुद्र में रह सकती है ये पनडुब्बी

मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक​ ​​वाइस एडमिरल (सेवानिवृत्त) नारायण प्रसाद​ ने ​​पश्चिमी नौसेना कमान के चीफ ऑफ स्टाफ ऑफिसर​ (तकनीकी)​ रियर एडमिरल बी शिवकुमार​ को ​आईएनएस करंज​ पनडुब्बी सौंपी​।​ भारत में बनी कलवरी क्लास की तीसरी पनडुब्बी आईएनएस करंज भी समुद्री परीक्षणों में खरी उतरी है। करंज को साल 2018 में समुद्र के परीक्षणों के लिए भेजा गया था। कलवरी क्लास की पहली 02 पनडुब्बियां कलवरी और खंडेरी पहले ही नौसेना में शामिल हो चुकी हैं।

कलवरी क्लास की कुल 6 पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई के मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड ने फ्रांसीसी कंपनी मेसर्स नेवल ग्रुप के साथ किया है। यह पनडुब्बी 50 दिनों तक समुद्र में रह सकती हैं और एक बार में 12 हजार किमी तक की यात्रा कर सकती हैं। इसमें 8 अफसर और 35 नौसैनिक काम करते हैं और ये समुद्र की गहराई में 350 मीटर तक गोता लगा सकती हैं।

समुद्र के अन्दर बारूदी सुरंगें बिछाने में भी सक्षम

कलवरी क्लास की पनडुब्बी समुद्र के अंदर 37 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती हैं। इनमें समुद्र के अंदर किसी पनडुब्बी या समुद्र की सतह पर किसी जहाज को तबाह करने के लिए टॉरपीडो होते हैं। इसके अलावा समुद्र में बारूदी सुरंगें भी बिछा सकती है।

आईएनएस करंज स्टेल्थ और एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन समेत कई तरह की तकनीकों से लैस है। इसलिए इसे लंबी दूरी वाले मिशन में ऑक्सीजन लेने के लिए सतह पर आने की ज़रूरत नहीं है। इस तकनीक को डीआरडीओ के नेवल मैटेरियल्स रिसर्च लैब ने विकसित किया है। आईएनएस करंज को 2018 में समुद्री परीक्षणों के लिए भेजा गया था। इसे लगभग एक साल तक बंदरगाह से लेकर खुले समुद्र में कई तरह के परीक्षणों से गुजारा जाना था। अब 2020 में पूरे हुए समुद्री परीक्षणों में यह खरी उतरी है, इसलिए अब चार से पांच महीने के अंदर नौसेना के बेड़े में शामिल हो सकती है।

सतह और पानी के भीतर से टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल दागने की क्षमता

INS करंज में सतह और पानी के अंदर से टॉरपीडो और ट्यूब लॉन्च्ड एंटी-शिप मिसाइल दागने की क्षमता है। यह सटीक निशाना लगाकर दुश्मन की हालत खराब कर सकती है। इसके साथ ही इस पनडुब्बी में एंटी-सरफेस वॉरफेयर, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, खुफ़िया जानकारी जुटाने, माइन लेयिंग और एरिया सर्विलांस जैसे मिशनों को अंजाम देने की क्षमता है। स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी आईएनएस करंज में ऐसी अत्याधुनिक तकनीक ​​का इस्तेमाल किया गया है, जिससे दुश्मन देशों की नौसेनाओं को इसकी टोह लेना मुश्किल होगा। इनमें अकुस्टिक साइलेंसिंग, लो रेडिएटेड नॉइज़ लेवल, हाइड्रो डायनेमिकली ऑपटिमाइज़्ड शेप तकनीक शामिल है। सामान्य तौर पर पनडुब्बी को उसकी आवाज की वजह से पकड़ा जाता है लेकिन इस पनडुब्बी में आवाज को काफ़ी कम किया गया है।

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