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पिता के बाद अब बेटे ने दी देश के लिए शहादत!

शहीद-आशुतोष

नई दिल्ली/जौनपुर। मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के बांदीपुरा में हुए आतंकी हमलों में शहीद हुए सेना के जवानों को उनके गृहक्षेत्र में पूरे सम्मान के साथ आखिरी विदाई दी गई। इस मुठभेड़ में तीन जवान शहीद हो गए थे जबकि उन्होंने एक आतंकी को मार गिराया था। इन तीन जवानों में हरियाणा के मेजर सतीश दहिया, नैनीताल के धर्मेन्द्र कुमार और जौनपुर के आशुतोष यादव शामिल हैं। इन सभी वीर जवानों को नाम आँखों से लोगों ने विदा किया।





जौनपुर के आशुतोष यादव

शहीद-आशुतोष

जौनपुर में शहीद आशुतोष को श्रद्धांजलि देने उमड़ा जनसैलाब

जवान आशुतोष यादव का पार्थिव शरीर बदलापुर तहसील स्थित उनके पैतृक गांव सुल्तानपुर पहुंचा तो पूरे गांव की आंखें नम हो गईं। शहीद के पार्थिव शरीर को कंधा देने पूरा गांव उमड़ पड़ा, जिससे वहां जाम लग गया। पुलिस अधीक्षक अतुल सक्सेना ने जाम हटवाया तब कहीं जाकर शहीद का पार्थिव शरीर रामघाट के लिए भेजा जा सका। मुखाग्नि उनके बड़े पिता लालजी यादव ने दी। बड़ा ही मार्मिक द्रश्य था। 

शहीद-आशुतोष

जौनपुर में शहीद आशुतोष को श्रद्धांजलि देते पुलिस अधीक्षक अतुल सक्सेना और अन्य प्रशासनिक अधिकारी

आशुतोष के पिता लाल साहब यादव भी सेना में थे। कारगिल युद्ध में लड़ते हुए वह शहीद हो गए थे। 24 अप्रैल 2016 को आशुतोष की शादी मधु के साथ हुई थी लेकिन अभी गौना नहीं हुआ था। गौना 9 मार्च को आने वाला था। लेकिन उसके पहले ही…। आशुतोष के परिवार में मां के अलावा एक दिव्यांग भाई संदीप और दो बहनें पूनम और पूजा हैं। पूनम ग्रेजुएशन कर रही है जबकि पूजा 10 वीं क्लास में है। परिवार के मुताबिक़ पिता की वजह से आशुतोष का रुझान बचपन से ही सेना की ओर था। आशुतोष श्रीनगर के बांदीपुर क्षेत्र में 111 राकेट रेजीमेंट में सिपाही थे।

नारनौल के मेजर सतीश दहिया

मेजर-सतीश-दहिया

मेजर सतीश दहिया अपने बेटे के साथ (फ़ाइल फोटो )

मुठभेड़ में जख्मी सतीश दहिया को अगर जल्द इलाज मिल जाता तो शायद उनकी जान बच जाती लेकिन जल्दी अस्पताल पहुंचाने में बाधा बन गए आतंकियों के हमदर्द पत्थरबाज। वह अपने पिता की इकलौती संतान थे। उनकी ढाई साल की एक बेटी है। वह नारनौल जिले के बनिहाडी गाँव के रहने वाले थे। वह मुठभेड़ कर रही टीम की अगुवाई कर रहे थे। वह 2009 में सेना में भर्ती हुए थे और 30 राष्ट्रीय रायफल्स में मेजर पद पर थे। वह आतंकवाद विरोधी कई अभियानों का हिस्सा रहे थे और वीरता पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके थे।

नैनीताल के धर्मेन्द्र

शहीद जवान धर्मेन्द्र कुमार शाह उत्तराखंड के नैनीताल के रहने वाले थे। अपने भाई की शहादत पर उनके छोटे भाई को गर्व है तो गुस्सा भी। उनका कहना है कि अगर मौक़ा मिला तो मैं भी देश के काम आना चाहूँगा। उनका कहना है कि मैं बदला लेना चाहता हूँ उन आतंकियों से जिनकी गोली ने मेरा भाई छीन लिया। धर्मेन्द्र के पिता किसान हैं।

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