Air Force

निर्मलजीत सिंह सेखों के अदम्य साहस को सलाम

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों

रविवार (8 अक्टूबर) को वायुसेना दिवस है। भारतीय वायुसेना और उसके जाबांजों के शौर्य तथा अदम्य साहस के अनगिनत किस्से हैं लेकिन वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जो कारनामा फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने किया, वैसा शायद ही किसी ने किया हो। महज 26 बरस के निर्मल ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।





वह 14 दिसंबर (1971) का दिन था। निर्मलजीत सिंह श्रीनगर में तैनात थे। पाकिस्तान ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर हमला कर दिया। एक के बाद एक उसके छह विमान आए और हवाई अड्डे को निशाना बनाना शुरू कर दिया। हमला अप्रत्याशित था। दुश्मन के हवाई जहाज गोता मारते, बम-गोलियां बरसाते और फिर आकाश की और बढ़ चलते। ऐसी स्थिति में हैंगर से विमान निकाल कर उड़ान भरना भी संभव प्रतीत नहीं हो रहा था। हैंगर से विमान निकाल कर उड़ान भरने तक एक निश्चित समय लगता है। और इस बीच अगर दुश्मन के विमान फिर आ पहुंचे तो रनवे पर खड़े विमान का नष्ट होना तय समझिए। दुश्मन के विमान पहले ही हमले में हवाई पट्टी को काफी नुकसान पहुंचा चुके थे।

थोड़ी देर में चक्कर काटकर दुश्मन के विमान दोबारा आए। उन्होंने गोता लगाते हुए फिर बमबारी की और पुनः आने के लिए फिर आकाश की ओर बढ़ चले। पर इस बीच निर्मलजीत सिंह सेखों वक्त गंवाए बिना अपने विमान नेट में जा बैठे। इंजन स्टार्ट कर दिया। उन्होंने तेजी से हिसाब लगा लिया था कि दुश्मन के विमान को आने में कितना समय लगेगा। दुश्मन के विमान वापस आने के समय में चंद सेकंड का हेरफेर बड़ा खतरा साबित हो सकता था। क्षतिग्रस्त रनवे एक अलग खतरा था। पर निर्मलजीत सिंह ने खतरा उठाया। दुश्मन के विमान हमला कर जैसे ही पलटे उन्होंने अपने विमान को हवाई पट्टी पर मोड़ा और देखते ही देखते विमान हवा से बातें करना लगा।

इसी भारत-पाक युद्ध में मुस्तैदी के साथ अपनी भूमिका निभाने वाले मेजर जनरल (सेवा निवृत्त) सूरज प्रकाश भाटिया ने उनके बारे में लिखा है-‘दुश्मन के छह आधुनिक विमान सिर पर मंडरा रहे थे और नेट जैसे पुराने ढर्रे के विमान में बैठा एक अकेला जांबाज उनसे लोहा लेने ऊपर जा चढ़ा। ऐसी हिम्मत तो आज तक किसी ने नहीं दिखाई थी। ऐसा जोखिम भरा काम कोई विरला रणबांकुरा ही कर सकता है।’

सचमुच विरले रणबांकुरे ही थे निर्मलजीत सिंह सेखों। उन्हें पता था कि पाकिस्तान के अपेक्षाकृत छह आधुनिक विमानों से मुकाबला आसान नहीं है। पर उन्हें अपने युद्ध कौशल और अपने प्यारे नेट विमान पर भरोसा था। दुश्मन हैरान कि उनके छह विमानों के हमले के बीच कौन है जो मुकाबले के लिए आ गया। सेखों ने दुश्मन के एक विमान को टारगेट कर अपने हवाई जहाज में लगी तोप दाग दी। तोप से निकले गोले ने दुश्मन के विमान के दो टुकड़े कर दिए। हमले से हक्का-बक्का दुश्मन कुछ समझ पाता इससे पहले ही सेखों ने दूसरे विमान पर गोला दागा। दूसरे विमान में आग लग गई।

दुश्मन के बचे चारों विमानों ने भारतीय रणबांकुरे सेखों को घेर लिया। काफी देर तक आकाश में जोर आजमाइश और पाकिस्तानी विमानों को छकाने के बाद निर्मलजीत सिंह देश के लिए बलिदान हो गए। रोंगटे खड़े कर देनी वाली यह घटना इतिहास का अभिन्न अंग बन गई और भावी पीढ़ियों को इस बात की प्ररेणा दे गई जान से ज्यादा कीमती मातृभूमि होती है।

उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 26 बरस थी। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने पराक्रम की ऐसी कहानी लिख दी है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। भारतीय माता के इस सपूत के साहस ने दुश्मन का मनोबल तोड़ दिया था। मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वह भारतीय वायुसेना के पहले और एकमात्र अफसर बने जिन्हें यह सम्मान मिला। उनकी वीरता के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं।

Comments

Most Popular

To Top