Air Force

स्पेशल रिपोर्ट: मिग- 27 लड़ाकू विमान कल वायुसेना को कह देगा अलविदा

MIG-27
फाइल फोटो

नई दिल्ली। चार दशकों की सेवा के बाद  भारतीय वायुसेना का मिग-27 विमानों का बेड़ा अंतिम उड़ान भरेगा। जोधपुर वायुसैनिक अड्डे पर मिग- 27 का स्कोरपियो दस्ता- 29 शुक्रवार को एक समारोह में  रिटायर घोषित कर दिया जाएगा। गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना ने 2009-10 में मिग- 23 विमानों को  रिटायर कर दिया था।





यह मौका न केवल भारतीय वायुसेना के लिये एक विमान किस्म को रिटायर करने का होगा बल्कि एक खास तकनीक वाले  स्विंग विंग विमानो के इस्तेमाल के एक युग की समाप्ति होगी। यह विमान अपने डैने आगे पीछे घुमा कर किसी खास समाघात भूमिका में  अपनी सक्षमता को बढ़ा सकता है। साठ के दशक में यह तकनीक वाला विमान  सैनिक विमानन पर प्रभुत्व स्थापित करने वाला था। इसकी अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि यह नब्बे के दशक के दौरान विकसित स्टील्थ तकनीक वाले विमानों जैसी सनसनी पैदा करता था।

स्विंग विंग तकनीक की वजह से इस विमान को उड़ान भरने के लिये छोटी हवाई पट्टी की जरुरत पड़ती थी।  इस वजह से उड़ान के दौरान यह अघिक वजन के हथियार लेकर उड़ सकता था।  इसके डैने को पीछे मोड़ने की वजह से उड़ान के दौरान  इसका खिंचाव कम हो जाता था और  इसकी गति अधिक हो जाती थी।  इस वजह से यह विमान हवाई समाघात में अधिक लचीलापन दिखा सकता था।

इसकी इन क्षमताओं को देखते हुए अमेरिका ने एफ-111 विमान का विकास और उत्पादन शुरू किया  जिसने साल 1991 के कुवैत- इऱाक युद्ध में प्रभावी भूमिका निभाई।

स्विंग विंग तकनीक वाला सोवियत मूल का मिग-27 विमान पहली बार अस्सी के दशक में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया।  इस विमान का जमीनी हमला के लिये साल 1999 के करगिल युद्ध में भी इस्तेमाल किया गया।  मिग-27 विमान  मिग-23 विमानों की  जमीनी हमला करने वाली किस्म के तौर पर भी विकसित हुआ। स्विंग विंग तकनीक का 60 के दशक में इतना रौब हो गया कि इसे सभी वैमानिकी समाघात का जवाब माना जाने  लगा।

सोवियत संघ से अस्सी के दशक में इस विमान को हासिल करने के बाद हिदुस्तान एरोनाटिक्स को 165 विमान भारत में उत्पादन करने का फैसला  लिया गया।

सोवियत संघ ने बाद में  सु-17 नाम का स्विंग विंग ग्राउंड अटैक विमान बनाया। स्विंग विंग तकनीक के  आधार पर ही सोवियत संघ ने  टीयू-22-एम बैकफायर बाम्बर नाम का विमान विकसित किया। इस विमान पर लम्बी दूरी की क्रूज मिसाइलें तैनात की गई जिससे इस विमान का खौफ दुश्मन देशों में पैदा हो गया।

लेकिन स्विंग विंग तकनीक की कुछ खामियां भी थीं जिससे बाद की पीढ़ी के विमानों ने इस तकनीक को त्याग दिया।

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