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डोकलाम विवाद: वो 5 बातें, जो बता रहीं हैं कि चीन पीछे हटेगा

डोकलाम में अंततः चीन पीछे हटता नजर आ रहा है। पहले खबरें आईं कि उसके सैनिक 100 मीटर पीछे हटने को तैयार हैं। चीन सरकार के आंतरिक सूत्र बता रहे हैं कि इस मामले में भारत नहीं, चीन फँस गया है।





अब वह इस मामले से हाथ खींचने के रास्ते तलाश रहा है। चीन को लगता था कि भारत अंततः धमकियों से डर जाएगा। ऐसा हो नहीं पाया। अब चीन नाक बचाने के लिए रास्ते तलाश रहा है। अभी गतिरोध जारी है, पर हालात जिस दिशा में जा रहे हैं, उनसे लगता है कि चीन को वार्ता के मार्ग पर वापस आना पड़ेगा, जिसकी माँग भारत कर रहा है। फिलहाल इस मामले में पाँच निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:-

निरर्थक हुईं युद्ध की धमकियाँ

अच्छी बात यह है कि इस मामले में भारत की ओर से युद्ध की धमकी एकबार भी नहीं दी गई। सारी धमकियाँ चीन की तरफ से आईं। इस दौरान चीनी सेना ने तिब्बत में युद्धाभ्यास भी किया। यह भी परोक्ष धमकी थी। चीन की इच्छा है कि भारत एकबार को अपनी सेना हटाने को तैयार हो जाए। इधर भूटान ने दूसरी बार कहा है कि चीन जिस जमीन की बात कर रहा है, वह हमारी है। एक बात से चीन के सारे तर्क धुल जाते हैं। यदि यह जमीन चीन की है, तो वह लंबे अरसे से इसके स्वामित्व को लेकर भूटान के साथ बातचीत क्यों कर रहा है?दरअसल चीन ने इस इलाके में सड़क बनाने का फैसला कर लिया, यह नहीं सोचा कि इसका निहितार्थ क्या है।

सीमा पर खामोशी

पिछले एक हफ्ते में चीनी सीमा पर सैनिकों की संख्या में किसी किस्म की वृद्धि नहीं हुई है। केवल ल्हासा में 12-14 सुखोई विमान खड़े हैं। एक संवाददाता ने शिगात्से एयरबेस के पास से गुजरते हुए तीन सुखोई और सात जे-10 विमानों को गिना। ल्हासा से शिगात्से के बीच किसी प्रकार की सैनिक गतिविधि नहीं है। केवल ल्हासा-बीजिंग रेलवे लाइन के पास परेड के लिए लाई गई कुछ बख्तरबंद गाड़ियाँ खड़ी नजर आती हैं। इसका मतलब है कि चीन की सैनिक गतिविधि ज्यादा से ज्यादा डोकलाम में भारतीय सेना के सामने निःशस्त्र सैनिकों की कतार बनाने तक सीमित रहेगी। चीनी अधिकारियों का मानना है कि दोनों देश अपनी गतिविधियों को यहीं तक सीमित रखेंगे, बढ़ाएंगे नहीं, क्योंकि दोनों नाभिकीय शक्तियाँ हैं।

विश्व मंच पर चीन की छवि खराब

चीन पहले से ही दक्षिण चीन सागर में तनाव के कारण वैश्विक दबाव में था। अब डोकलाम के विवाद ने उसकी छवि लड़ाकू और हमलावर देश की बना दी है। हाल में आसियान विदेश मंत्री सम्मेलन में उसे नीचा देखना पड़ा। वह पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आ रहा है, जिसकी छवि पहले से खराब है। चीनी नेतृत्व ने डोकलाम को लेकर स्थितियों का गलत अनुमान लगाया। अभी तक इस मामले में जो भी उत्तेजना फैली है, वह चीन की तरफ से है। इस उत्तेजना को बढ़ाना चीन के हित में नहीं है। पर यह मामला उसके गले में हड्डी की तरह फँस गया है। वह इससे बाहर निकलना भी चाहे तो कैसे निकले? वह चाहता है कि उसकी जनता का दिमाग इससे हटे तो वह सेना को पीछे हटे। चीनी नेतृत्व ने एक गलती पहले ही कर दी है। उसके विदेश मंत्रालय ने न जाने किस तुफैल में घोषणा कर दी कि भारत ने अपने सैनिकों की संख्या घटा दी है। ऐसा उसने अपनी नाक बचाने के इरादे से किया था, पर इसका प्रभाव उल्टा पड़ा।

आर्थिक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं

हाल में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में इस विषय पर हुई चर्चा के जवाब में कहा था कि चीन के साथ संबंध केवल सीमा-विवाद तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि चीन के साथ बातचीत व्यापक दायरे में है। उनका आशय साफ था कि आर्थिक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। भारत में चीनी निवेश काफी बड़े स्तर पर है। भारत में चीनी मोबाइल फोनों और दूसरी उपभोक्ता सामग्री की भरमार है। इससे भारतीय कारोबार की मदद ही हो रही है।

विदेश मंत्रालय और पीएमओ का संयम

इस पूरे मामले में भारत के विदेश मंत्रालय और पीएमओ ने किसी भी स्तर पर संयम नहीं खोया। भारत ने शुरू से कहा कि हमने 30 जून को जो बयान जारी किया था वही हमारे रुख को स्पष्ट करता है। भारत का आशय था कि बातें मीडिया के मार्फत नहीं, राजनयिक संपर्क से होनी चाहिए। देश के रक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने चीन जाकर बातचीत भी की। जी-20 में नरेंद्र मोदी और शी चिनफिंग की बात हुई और अभी अगले महीने होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में फिर होगी। भारत भी चीन से रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहता। हमें एनएसजी की सदस्यता और सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के लिए चीनी मदद चाहिए। दोनों देशों के बीच किसी न किसी स्तर पर संवाद चल ही रहा है। पाकिस्तान के मुकाबले चीन के साथ हमारा संवाद बेहतर है।

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