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 स्पेशल रिपोर्ट- राफेल और HAL के बीच कभी कोई समझौता हुआ ही नहीं : रक्षा मंत्री

नई दिल्ली। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि राफेल बनाने वाली फ्रांसीसी कम्पनी डसाल्ट और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लि. (HAL) के बीच भारत में ही लड़ाकू विमान बनाने का कभी कोई समझौता नहीं हुआ क्योंकि उत्पादन की शर्तों पर सहमति नहीं बनी। इसलिये यह कैसे कहा जा रहा है कि एनडीए सरकार ने राफेल सौदे का आफसेट ठेका हिदुस्तान एरोनॉटिक्स को नहीं दिया। उन्होंने यहां मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि यदि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स को ही ठेका देने की बात थी तो यूपीए सरकार ने क्यों नहीं उसे यह काम सौंपा।





रक्षा मंत्री ने कहा कि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स की शर्तों पर यूपीए सरकार ने डसाल्ट से क्यों नहीं समझौता किया। यूपीए सरकार के दौरान 18 विमान तैयार अवस्था में और बाकी 108 भारत में निर्माण के जरिये हासिल करने की बात थी लेकिन तब यूपीए ने यह समझौता नहीं किया। आखिर यूपीए सरकार ने HAL को विमान भारत में बनाने के लिये क्यों नहीं चुना। वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन की संख्या घटती जा रही थी इसलिये यूपीए सरकार को इस बारे में कोई फैसला करना चाहिये था। निर्मला ने कहा कि यूपीए सरकार के दौरान चूंकि कोई समझौता नहीं हुआ इसलिये यह कैसे कहा जा रहा है कि मौजूदा सरकार ने यूपीए की तुलना में अधिक भुगतान किया। जहां तक एक विमान की मूल कीमत की बात है हमने जो सौदा किया वह नौ प्रतिशत कम पर ही सम्पन्न हुआ।

रक्षा मंत्री ने कहा कि वायुसेना के पास आदर्श तौर पर 42 स्क्वाड्रन होने चाहिये और यूपीए सरकार के दौरान यह संख्या घट कर 33 पर आ गई थी तब यूपीए सरकार ने इसकी भरपाई के लिये क्या किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यही आकलन कर फ्रांस से राफेल विमानों की तत्काल सप्लाई पर बात की। यह कोई दुकान के काउंटर से सीधी खरीद की बात नहीं थी। यह सौदा डेढ़ साल की सौदेबाजी के बाद सम्पन्न हुआ और इसे वायुसेना के तकनीकी विशेषज्ञों ने अंतिम रुप दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि बार-बार यह कहा जा रहा है कि आखिर HAL को क्यों नहीं सौदा दिया गया लेकिन उन्हें यह पता होना चाहिये कि यूपीए सरकार के जमाने से ही यह नियम था कि हथियार बेचने वाली कम्पनी भारत से आफसेट के तहत उसके आधी लागत का सामान हासिल करने के लिये प्राइवेट सेक्टर से यह सौदा कर सकती है। इसलिये आफसेट के तहत जो भारतीय साझेदार चुना गया उसमें हमारी कोई भूमिका नहीं थी।  राफेल सौदे की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करवाने की मांग को ठुकराते हुए उन्होंने कहा कि आखिर संसद में इस पर काफी बहस हो चुकी है फिर संयुक्त संसदीय समिति की क्या जरूरत है।  उन्होंने इन अटकलों को भी खारिज किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट की मंजूरी लिये बिना ही फ्रांस के साथ राफेल सौदा करने का ऐलान कर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 के फ्रांस दौरे में केवल सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये थे।

रूस से एस-400 एंटी मिसाइल प्रणाली खरीदे जाने के सौदे के बारे में रक्षा मंत्री ने कहा कि इस बारे में रूसी कम्पनी से सौदेबाजी पूरी हो चुकी है। राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के भारत दौरे में इस पर दस्तखत होगा या नहीं इस बारे में वह कुछ नहीं कह सकती।

 

 

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