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स्पेशल रिपोर्ट: मास्को में अफगान वार्ता में भारत की रुचि नहीं

मास्को में अफगान वार्ता

नई दिल्ली। अफगानिस्तान में शांति स्थापना के प्रयासों के तहत रूस द्वारा मास्को में चार सितम्बर को आयोजित सम्मेलन में भाग लेने को लेकर भारत उत्साहित नहीं है।





इस बारे में पूछे जाने पर यहां विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये भारत को न्योता मिला है लेकिन इसमें भाग लेने के बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है। गौरतलब है कि इस शांति सम्मेलन में पहली बार तालिबान को भी आमंत्रित किया गया है। शायद इसके मद्देनजर अफगानिस्तान की अशरफ गनी की सरकार ने सम्मेलन में जाने से इनकार कर दिया है जब कि अमेरिकी प्रशासन ने भी मास्को सम्मेलन की निरर्थकता बाते हुए भाग लेने से मना कर दिया है।  सम्मेलन में अमेरिका, भारत, चीन, पाकिस्तान सहित 12 देशों को आमंत्रित किया गया है।

 गौरतलब है कि रूस की सरकार पिछले कुछ अर्से से तालिबान को प्रोत्साहित कर रही  है और उसे सैनिक मदद भी गोपनीय तौर पर रूस द्वारा देने की रिपोर्टें है। रूस द्वारा तालिबान को लेकर अपनी नीति में भारी बदलाव को लेकर सामरिक हलकों में हैरानी है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि रूस को अफगानिस्तान में तालिबान की तुलना में इस्लामी स्टेट के लड़ाके अधिक खतरनाक लग रहे  हैं इसलिये वह तालिबान को आगे बढ़ाकर इस्लामिक स्टेट से  पहले निबटना चाहता है।

 इधर  अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते छाप से अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों में घब़ड़ाहट है। अफगानिस्तान के गजनी शहर में तालिबान ने जिस तरह सरकारी फौज को पीछे धकेला है वह अफगानी सुरक्षा बलों के लिये भारी चुनौती है। यहां सामरिक हलकों में कहा जा रहा है कि वास्तव में तालिबान की सेना में पाकिस्तानी जेहादी और पाक सेना के अफसर भी शामिल हो गए हैं औऱ वे मिल कर अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बल(ए एन ए) के सैनिकों से ल़ड़ रहे हैं।

  तालिबान के  सैनिकों के भेष में अपने सैनिकों को अफगानिस्तान के भीतर सरकारी फौज से ल़ड़ाई लड़वाने के लिये भेजने पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय मौन है । पर्यवेक्षकों का कहना है कि वास्तव में तालिबान के नाम पर पाकिस्तान की सेना काबुल की लड़ाई लड़ रही है।

 इसी के मद्देनजर मास्को सम्मेलन में तालिबान को शांति वार्ता के लिये आमंत्रित करने पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने नाक भौं सिंकोड़ी है। यही वजह है कि मास्को शांति वार्ता में अमेरिका ने भाग लेने से जब मना किया तो अफगानिस्तान की सरकार ने भी मास्को में अपने प्रतिनिधि भेजने से इनकार कर दिया। भारत भी देखो और प्रतीक्षा करो की नीति अपना रहा है और रूस से दोस्ती की खातिर भारत ने यदि अपना प्रतिनिधि भेजा भी तो वह काफी निचले स्तर का हो सकता है।

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