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स्वतंत्रता दिवस विशेषः नौसेना की चुनौतियों के अनुरूप पोत नहीं

युद्धपोत

भारतीय नौसेना के पास चुनौतियां निरंतर बढ़ती जा रही हैं और नये पोतों को हासिल करने की प्रक्रिया काफी ढीली चल रही है। इसलिये सामरिक हलकों में नौसेना की ताकत को प्रतिदंवद्वी देशों की तुलना में चिंताजनक बताया जा रहा है। मिसाल के तौर पर यदि पनडुब्बियों को लें तो चीन के पास 68 हैं औऱ भारत के पास केवल 15. पाकिस्तान के पास भी 8 पनडुब्बियां हैं। महासागरों में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में पनडुब्बियों की अहम भूमिका होती है लेकिन इसके अनुरूप भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े को बढ़ाया नहीं जा सका है।





किसी देश के समुद्री हितों की रक्षा में नौसेना की अग्रणी भूमिका होती है और जिस देश के पास जितना बड़ा समुद्री इलाका अधिकार क्षेत्र में होता है उस देश की नौसेना की जिम्मेदारी उतनी ही अधिक हो जाती है। भारत के पास सात हजार किलोमीटर से अधिक लम्बा समुद्र तट है और 20 लाख वर्ग किलोमीटर विशेष आर्थिक क्षेत्र है। इसके अलावा लक्षद्वीप एवं अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में सैंकड़ों द्वीप है जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी भारतीय नौसेना की ही है।

इसके अलावा अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के तट से लेकर भारत को छूने वाले हिंद महासागर के विशाल समुद्री इलाके पर अपना दबदबा बनाए रखने की भी चुनौती हाल के वर्षों में बढ़ती जा रही है क्योंकि इस सागरीय इलाके में चीन अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाता जा रहा है। इन बढ़ती चुनौतियों और जिम्मेदारियों के मद्देनजर भारतीय नौसेना के पास जिस संख्या में पनडुब्बियों और युद्धपोतों की जरुरत है वे मुहैया नहीं कराई  गई हैं। सबसे बड़ी मिसाल है भारतीय नौसेना की पनडुब्बी क्षमता को समुचित स्तर पर नहीं बनाए रखना। भारतीय नौसेना के पास फिलहाल 15 पनडुब्बियां हैं जिनमें एक रूस से लीज पर ली गई परमाणु पनडुब्बी आईएनएस चक्र और दूसरी देश में ही बनी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत। दूसरी ओर चीन के पास 68 पनड़ुब्बियां हैं जिसमें छह परमाणु पनडुब्बियां हैं। पाकिस्तान के पास भी आठ डीजल पनडुब्बियां हैं जो भारत की तुलना में अधिक ही कही जा सकती है।

पिछले दशक के शुरू में भारतीय नौसेना ने तय किया था कि सन 2030 तक उसके पास 24 पनडुब्बियां होनी चाहिये लेकिन पिछले एक दशक से भारतीय रक्षा मंत्रालय यह नहीं तय कर पाया है कि फ्रांस की छह स्कारपीन पनडुब्बियों के बाद छह और पनडुब्बियों को हासिल करने के लिये क्या प्रक्रिया अपनाई जाए। भारतीय नौसेना के पास जो रूस से आयातित किलो वर्ग की डीजल पनडुब्बियां हैं वे अगले कुछ वर्षों के भीतर रिटायर होने लगेंगी और चूंकि स्कारपीन के अलावा नई पनडुब्बियों का सौदा अभी नहीं हुआ है इसलिये पनडुब्बियों की क्षमता बढ़ने के बजाय अगले दशक के मध्य तक मौजूदा स्तर से बढ़ेंगी नहीं। एक तरफ फ्रांसीसी स्कारपीन पनडुब्बियां बेड़े में जुडेंगी तो दूसरी ओर किलो वर्ग की पनडुब्बियों को अगले दशक के मध्य से रिटायर करते जाना होगा क्योंकि पनडुब्बियों की करीब तीन दशक की सेवा अवधि पूरी होने लगेगी।

सागरीय इलाके पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिये जो दूसरा शस्त्र मंच होता है वह विमानवाहक पोत है। कभी भारतीय नौसेना के पास एक साथ दो विमानवाहक पोत विराट और विक्रांत होते थे लेकिन ये दोनों अब रिटायर हो चुके हैं औऱ केवल विक्रमादित्य ही बचा है। दूसरा विमानवाहक पोत देश में ही बन रहा है जो दो साल बाद बन कर पूरा होगा। विमानवाहक पोतों के जरिये हिंद महासागर के विशाल इलाके पर प्रभावी चौकसी और दबदबा स्थापित किया जा सकता है। बीच सागर में तैनात इन विमानवाहक पोत  पर तैनात लडाकू विमान और टोही हेलीकाप्टर समग्र हिंद महासागर पर प्रभुत्व स्थापित कर सकते हैं। चूंकि भारत के दो समुद्र तट हैं पूर्वी और पश्चिमी इसलिये दोनों सागरीय इलाके में हमेशा एक विमानवाहक पोत तैनात रखना होगा लेकिन यह ताकत हासिल करने में कुछ साल लगेंगे।

भारतीय नौसेना की जिम्मेदारी चूंकि हिंद महासागर से पार प्रशांत सागर तक बढ़ती जा रही है इसलिये भविष्य की नई सामरिक चुनौतियों के मद्देनजर महासागरों में अपने सामरिक औऱ आर्थिक हितों की रक्षा के लिये नौसेना को समुचित संसाधन मुहैया कराने होंगे।

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