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अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं का रिट्रीट करना कितना तर्क संगत है?

अमेरिकी सेना

ललित मोहन बंसल, लॉस एंजेल्स से…

ईद पर तीन दिन के युद्ध विराम से उत्साहित अफगानिस्तान में राष्ट्रपति अशरफ़ गनी और तालिबान ने ‘मेल-मिलाप’ के बाद स्थिरता और शांति स्थापना की भनक दी तो अमेरिकी सेना ने भी ‘रिट्रीट’ के लिए सपने बुनने शुरू कर दिए। यह भ्रम जुम्मे की नमाज़ से पहले टूट गया। तालिबानी लड़ाकों ने गजनी पर हमला कर दिया। हालांकि अमेरिकी वायु सेना की एक टुकड़ी ने काबुल के समीप गजनी से तालिबानी लड़ाकों को खदेड़ दिया।‘अल जज़ीरा’ की मानें तो अमेरिका सेना ने जवाबी हमले में तालिबान के 39 लड़ाकों को मार गिराया और गजनी पर पुनः सरकारी सेना का क़ब्ज़ा हो सका। यह घटना इतनी ताबड़तोड़ हुई कि तालिबान लड़ाकों ने गजनी पर नियंत्रण करने के इरादे से शहर में तैनात पुलिस कर्मियों पर गोलीबारी शुरू कर दी और देखते-देखते 14 को मार दिया, जबकि अन्य बीस को घायल कर दिया। उसने गजनी पर लगभग क़ब्ज़ा कर लिया था। सन 2015 में कुंडूज पर क़ब्ज़ा ज़माने के बाद तालिबान की ओर से गजनी पर नियंत्रण करने का यह पहला मौक़ा था। इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समझा जा रहा था।





चुनौती सिर्फ तालिबान से ही नहीं, इस्लामिक स्टेट से भी

यहाँ बड़ा सवाल यह है कि क्या इस घटना के बाद अमेरिका और नाटो देशों के सैन्य बलों घर वापसी तर्क संगत है? चुनौती सिर्फ़ तालिबान से ही नहीं है, सीरिया और इराक़ से हताश-निराश हो कर लौटे इस्लामिक स्टेट के उन तीन हज़ार लड़ाकों से भी है, जो अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों, खैबर पख्तुनवा और बलूचिस्तान में शिया बहुल समुदाय को मौत के घाट उतारने के लिए घात लगाए बैठे हैं। फिर ये गुट परस्पर भी भिड़ रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान सहित छह स्थानों पर वारदातें हुई हैं, इनकी ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है। इसमें बलूचिस्तान में पिछले महीने एक आत्मघाती दस्ते ने विस्फोट कर 151 लोगों की जानें लेने की ज़िम्मेदारी भी इस्लामिक स्टेट ने ली थी। इस घटना पर पाकिस्तानी सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी हतप्रभ रह गई थी।

पाकिस्तान में नई सरकार से सहयोग की अपेक्षा

पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ़ के नेता इमरान खान की जीत और उनके प्रधान मंत्री बनने की ख़बरों के बीच अशरफ़ गनी ने इमरान को शुभकामनाएँ दी। साथ ही यह आशा भी व्यक्त की कि वह अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिए अपेक्षित सहयोग देंगे। इसे एक अच्छी शुरुआत समझा जा रहा था। इमरान ने सहयोग का आश्वासन भी दिया था। यहाँ अशरफ़ गनी का इशारा पाकिस्तान स्थित सीमावर्ती क्षेत्रों में तालिबान सहित हक्कानी नेटवर्क और अल कायदा पर अंकुश लगाए जाने से था। इसके चंद दिनों बाद दोहा में अमेरिकी विदेश विभाग में सहायक सचिव एलिस वेल्स और तालिबान शांति वार्ता के लिए मिले थे। इस पर पाकिस्तान के प्रमुख दैनिक ‘डॉन’ ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका इन दिनों भारत को ज़्यादा तवज्जो देने में लगा हुआ है, लेकिन अंतत: अमेरिका को घूम-फिर कर पाकिस्तान की शरण में आना पड़ेगा। पाकिस्तान के इस कथन का आख़िर क्या अभिप्राय है? इसे समझना इसलिए ज़रूरी है कि वह तालिबान को अपने सीमा प्रांत खैबर पख्तुनवा की बीहड़ पहाड़ियों में छुपने की जगह देता आ रहा है। सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी का इन आतंकी गुटों को आशीर्वाद है।

अफगनिस्तान में चुनाव पर आतंकी गुटों की निगाहें  

अफ़ग़ानिस्तान में अक्टूबर में पार्लियामेंटरी चुनाव और 20 अप्रैल 2019 में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं। इसमें धन बल के साथ सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा होगा। अमेरिकी कांग्रेस, नाटो  और विश्लेषकों की मानें तो रिट्रीट के लिए यह समय उचित नहीं है। हालाँकि बुश और ओबामा रणनीति के अनुसार ट्रम्प जल्दी से जल्दी अपने सैनिकों की घर वापसी की वकालत में जुटे हैं। अमेरिकी नीति के विरुद्ध राजनयिकों से कहा जा रहा है कि वे सीधे तालिबान से बात करें। तालिबान ने पिछले महीने दोहा वार्ता में शांति वार्ता होने तथा अमेरिकी सेना की चरणबद्ध वापसी पर हुई बातचीत को स्वीकार किया है, हालाँकि अमेरिकी विदेश विभाग ने इतना माना है कि एलिस वेल्स पिछले दिनों दोहा में थीं। कहा यह जा रहा है कि तालिबान का मक़सद अमेरिकी सेना की विदाई ही नहीं, अफ़ग़ानिस्तान में फिर से सत्ता पर क़ाबिज़ होना है। अमेरिका अपनी सेना की घर वापसी के लिए तो तैयार है, लेकिन वह इस शर्त पर सहमत नहीं है कि सत्ता की बागडोर अकेले स्वतंत्र रूप से तालिबान के हाथों सौंप दी जाए। इस पर पाकिस्तान भले ही सहर्ष तैयार होगा, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में भारत अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। चीन भी अपने आर्थिक गलियारे के लिए अफ़ग़ानिस्तान का इस्तेमाल करना चाहता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका तालिबान को अकेले सत्ता का भार देने पर सहमत होगा, नामुमकिन है।

अफीम की खेती पर निर्भर है तालिबान

असल में तालिबान की लड़ाई अफ़ीम की खेती पर निर्भर है। इसे देखते हुए अमेरिकी सेना ने सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के ख़िलाफ़ जो नीति अपनाई थी, उस नीति को यहाँ अफ़ग़ानिस्तान में अपनाया गया। अफ़ीम की खेती को तबाह किया जाने लगा, भंडारण जलाए जाने लगे। तालिबान की कमाई एक चौथाई रह गई। लेकिन तालिबान ने गाँवों में तबाही मचानी शुरू कर दी। एक चौथाई जनता ही नगरों में रहती है, जो सुरक्षा की दृष्टि से कमोबेश सुरक्षित है। देश के 407 जिलों में 229 जिलें ही ऐसे हैं, जिन पर सरकार का सीधे नियंत्रण है, जबकि 119 जिलों में युद्ध की सी स्थिति है। फिर 59 जिलों में तो तालिबान का पूर्ण नियंत्रण है। ऐसी स्थिति में तालिबान ने अफ़ीम की खेती करने वालों से 60 प्रतिशत उगाही करना, गाँवों में बिजली और टोल टेक्स एकत्र करना तथा बड़े ज़मींदारों से लूटपाट करते हुए एक समानांतर प्रशासन चलाना शुरू कर दिया है। गाँवों में पुलिस चौकियाँ भी अब तालिबान की सेवा में तैनात रहती हैं। सेना ऐसी स्थिति में करे तो क्या करे? वह पहले ही शहरों में सिमट चुकी है। अफ़ग़ानिस्तान सरकार भी ज्ञान बघारने में लगी है कि घनी आबादी वाले क्षेत्रों में क़िलेबंदी मज़बूत करना ज़्यादा श्रेयस्कर होगा।

 

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