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योग और सुरक्षाबल

योग और सुरक्षाकर्मी

पांचवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पूरी दुनिया के साथ-साथ देश के सैन्यबलों और राज्यों के पुलिसकर्मियों द्वारा जोश, उमंग तथा जिम्मेदारी के साथ किया गया योगाभ्यास अगर ‘योग दिवस’ पर ही न सिमट कर प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल हो जाए तो सुरक्षाकर्मियों में देश की सुरक्षा तथा घर परिवार के बीच कर्तव्यपालन का संतुलन स्वत: ही स्थापित हो जाएगा। यह सामंजस्य बड़े काम का होगा। असंतुलित मन आज हम सभी को बीमार बना रहा है। फिर भला सरहद तथा देश की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी कैसे अछूते रह सकते हैं? आज पड़ोसी देशों की सैन्य चुनौतियों, आतंकवाद-नक्सलवाद-उग्रवाद के ऑपरेशन में कार्यरत सुरक्षाबल तथा गली-मुहल्लों, गांव-कस्बे व शहरों की कानून-व्यवस्था के पालन का जिम्मा संभाल रहे पुलिसकर्मी दबाव भरे वातावरण में काम कर रहे हैं। कई बार सुरक्षाकर्मियों का तनाव इस स्तर तक बढ़ जाता है कि जीवन में सामंजस्य न बैठा पाने से अवसाद व बेचैनी पैदा कर देता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर योग की महत्ता को समझना जरूरी है। योग पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है। इसे नियमित रूप से करने से ऐसे रसायन उत्पन्न होते हैं जो मन व शरीर दोनों को स्वस्थ्य बनाते हैं। इसी का नाम योग है।





लिहाजा दबे पांव आए तनाव व अवसाद को दूर करने में योग पूरी तरह सक्षम है। संपूर्ण योग करने से मन+शरीर स्वस्थ्य होता ही है और व्यक्ति अवसाद के बाद आत्महत्या जैसे कदम नहीं उठाता। दरअसल हाल के दिनों में सेना, अर्ध सैनिक बलों व पुलिसकर्मियों में अवसादग्रस्त होने तथा आत्महत्या करने की प्रवृति इसलिए बढ़ी है कि वह असंतुलित मन को काबू में नहीं कर पा रहे। रक्षा मंत्रालय का यह आंकड़ा बेहद चौकाने वाला है जिसमें कहा गया है कि 1 जनवरी, 2014 से 31 मार्च, 2017 के बाद 348 सैनिकों ने आत्महत्या की यानी सेना के तीनों अंगों में हर तीन दिन में एक सैनिक का आत्महत्या करना। यह चिंताजनक है।

मौजूदा हालात में भारतीय सेनाएं, अर्ध सैनिक बल, बाहरी दुश्मनों और देश के भीतर नक्सल-आतंकवाद का मुकाबला लंबे समय से कर रही हैं। यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि सैनिक का मनोबल पहले और हथियार दूसरे पायदान पर होते हैं। किसी जवान का मनोबल ही देश की सेवा, सरहद की हिफाजत के काम आता है। और अगर किसी जवान या अधिकारी का मन दबाव-खिंचाव से गुजर रहा हो तो उसका ड्यूटी कर पाना तो दूर वह खुद को असहाय समझकर जीवन समाप्त कर लेने की ओर उन्मुख हो जाता है। ऐसे में मेडिटेशन, आसन, प्राणायाम कारगर होते हैं न कि औषिधियां। सुरक्षाबलों के लिए आज कर्तव्यपालन में पहले से अधिक चुनौतियां हैं। अशांत क्षेत्रों में लंबे समय तक तैनाती, दुर्गम-दूरदराज इलाकों में लगातार ड्यूटी तथा घर परिवार से दूरी किसी भी जवान के लिए शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक रूप से परेशानी का सबब बन रही हैं।

यह ठीक है कि सैन्यबल व पुलिस अपने स्तर पर मानसिक दबाव से जूझ रहे अपने कर्मियों की मनोवैज्ञानिक कॉन्सलिंग करती हैं। उन्हें घर-परिवार की परेशानियां, लंबी तैनाती से जुड़ी बातों से निपटने का हल सुझाती हैं। इससे उन्हें फौरी तौर पर राहत मिलती है। पर इतने से ही बात बनती नहीं है। यदि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें जिंदगी की बारीकियों और सैन्य बल में ड्यूटी की सच्चाईयों को अधिक गहराई से विश्लेषित कर प्रशिक्षित किया जाए तो सैनिक का मन उस दिशा की ओर चल पड़ेगा जिसमें वह समझेगा कि व्यक्ति की मौजूदगी ही सर्वोपरि है और कर्म ही उसका हथियार है। योग यही सिखाने में मदद करता है।

देश के पुलिसकर्मी भी काम का बोझ होने, बिना छुट्टी काम करने, नींद की कमी आदि की वजह से शारीरिक व मानसिक रूप से असंतुलित हो रहे हैं। जिसका असर उनकी कार्य क्षमता और मनोदशा पर पड़ रहा है। बीते कई सालों में तो आईपीएस अफसरों तक ने आत्महत्या का रास्ता चुना है। यह प्रवृति इस बात की ओर इशारा करती है कि वे विभिन्न करणों से अवसाद की अंधी गुफाओं की ओर चले गए। देश की भीतरी सुरक्षा में आईपीएस का पद एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता है। आईपीएस अधिकारी ही देश की सुरक्षा में तैनात अर्धसैनिक बलों, सीबीआई, एनआईए आदि जांच एजेंसियों के मुखिया होते हैं। लिहाजा जरूरी यह है कि पूरे देश में तैनात बटालियनों में विशेषीकृत योग करने का ढांचा इस तरह विकसित हो कि पूरे साल सुरक्षाकर्मी योग कर सकें। ऐसा कदम उठाने और प्रतिदिन पूरे मनोयोग के साथ योगाभ्यास करने से योग दिवस की सार्थकता स्वत: ही नजर आएगी।

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