vishesh

क्या निर्मला सीतारमण रक्षा आवंटनों में बदलाव का संकेत देंगी?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि एक ही मंत्री ने उसी सरकार में रक्षा और वित्त दोनों का ही कार्यभार संभाला है। प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन सिंह की सरकार में अलग अलग अवसरों पर रक्षा और वित्त दोनों का ही कार्यभार संभाला है। जसवंत सिंह ने यही काम वाजपेयी सरकार में किया। मोदी की सरकार में अरुण जेटली ने दो अवसरों पर, मनोहर पर्रिकर से पहले एवं बाद में, एक ही साथ रक्षा और वित दोनों का ही कार्यभार संभाला है। वर्तमान में  निर्मला सीतारमन की पिछली नियुक्ति रक्षा मंत्री के रूप में थी  पर अब उनके जिम्मे वित्त मंत्रालय है। वह 05 जुलाई, 2019 को आम बजट पेश करेंगी।





अलावा इसके  राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अंतर्गत डिफेंस प्लानिंग कमिटी (डीपीसी) के गठन के साथ मोदी निश्चित रूप से  सशस्त्र बलों की क्षमताओं तथा इससे संबंधित मूलभूत बजटीय सहायता में कमी से अवगत होंगे। ये इनपुट वित्त मंत्रालय को भी उपलब्ध कराए जाएंगे क्योंकि उनका सचिव (व्यय) डीपीसी का भी एक सदस्य है। अजीत डोभाल जो डीपीसी के अध्यक्ष हैं  और नरेंद्र मोदी दोनों ही समान रूप से भारत के सामने बढ़ते खतरों और उनका सामना करने के लिए क्षमताओं को बढ़ाने की जरूरत से वाकिफ हैं।

एक पूर्व रक्षा मंत्री के रूप में  निर्मला सीतारमन को क्षमताओं में कमी और पूरे परिदृश्य पर लगातार बढ़ते खतरों पर इससे पड़ने वाले प्रभाव की जानकारी है। वह बालाकोट हमले से सीधे जुड़ी रही हैं और उन नुकसानों को जानती हैं जो बुढ़ा रहे बेड़ों के कारण वायु सेना को हो रहा है। उन्होंने सेना प्रमुखों से बातचीत की है और जेटली के अधीन कठोर रुख वाले वित्त मंत्रालय से फंड प्राप्त करने के उनके संघर्ष का समर्थन किया है। वास्तव में वित्त मंत्री के रूप में  उनसे बेहतर विकल्प और कोई नहीं हो सकता था जो उनकी क्षमताओं में कमी से बखूबी वाकिफ हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्हें फंड के लिए काफी सुनियोजित योजनाएं बनानी होंगी कि खजाना सीमित है। धन की आवश्यकता विकास, सामाजिक योजनाओं और अन्य सुधारों के लिए भी है जिसे सरकार इतना ही महत्वपूर्ण मानती है। आखिर राष्ट्र को भी तेजी से आगे बढ़ना है और इसकी आबादी की चिंताओं पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ-साथ  यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि बिना देश की सुरक्षा के  आंतरिक विकास भी बाधित होगा। इसी दलदल के भीतर उन्हें समाधान ढूंढने की जरूरत है। इसका समाधान रक्षा मंत्रालय के फिजूल व्यय में कमी करने के रूप में सामने आ सकता है।

उन्हें समाधान पाने के लिए वर्तमान रक्षा मंत्री के साथ बातचीत करने की आवश्यकता है। रक्षा मंत्रालय के भीतर की अपेक्षित फंड सृजित करने के माध्यम मौजूद हैं। पहला कदम रक्षा क्षेत्र के पीएसयू से निजात पाना है जो या तो नुकसान में हैं या फिर जिनके उत्पादों को खुले बाजार से प्राप्त किया जा सकता है। इससे राजस्व बढ़ने के साथ साथ निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोतरी होगी। यह एक मुश्किल भरा कदम हो सकता है लेकिन जिस सरकार को इतना मजबूत जनादेश मिला हो, वह इसे अमल में ला सकती है। अपने कार्यकाल के आरंभ में इस कदम की अनदेखी करने का अर्थ होगा एक अच्छा अवसर गंवा देना।

इसी से जुड़ा कदम है आर्डनेंस फैक्ट्रियों के लिए फंड में कटौती करना। उनके आधुनिकीकरण करने में पैसा बर्बाद करने के बजाए सशस्त्र बलों के साथ साझीदारी के विभिन्न विकल्पों के तहत निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए। रक्षा विनिर्माण में निजी क्षेत्र के विकास के साथ, आयात पर निर्भरता में कमी आएगी। यह आगे आने वाले वर्षों में लाभदायक सिद्ध होगा। सैन्य उपकरणों के आयात में हमेशा कुछ शर्तें जुड़ी रहती हैं। आपूर्तिकर्ता अहम मौकों पर स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति कम करने के द्वारा अपने हाथ खींच सकता है।

दूसरा विकल्प होगा  सरकार को चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी के एक स्थायी अध्यक्ष (पीसीसीओएससी) की नियुक्ति के लिए सरकार को मजबूर करना। जितनी जल्दी यह नियुक्ति होगी, संयुक्त योजना निर्माण एवं खरीद की प्रक्रियाएं उतनी ही जल्दी आरंभ हो जाएंगी। इससे यथार्थपूर्ण और संयुक्त खरीद योजनाएं बनेंगी। इस नियुक्ति के साथ रक्षा मंत्रालय एवं आईडीएस का विलय भी होना चाहिए। इससे दिल्ली में स्टाफिंग में कमी आएगी और इसके साथ साथ रक्षा मंत्रालय के रखरखाव की लागतें घटेंगी। इसके अतिरिक्त  रक्षा मंत्रालय के आंतरिक फंड में भी कटौती की जानी चाहिए जहां तर्कपूर्ण एएफटी निर्णयों के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ने जैसी फिजूल बातों पर बेवजह पैसे बर्बाद किए जाते हैं।

रक्षा मंत्रालय को इस बात पर भी जोर देना चाहिए कि तीनों सेनाएं राजस्व लागत में 7 से 10 प्रतिशत की कटौती करने का लक्ष्य निर्धारित कर अपने खर्च को कम करने के खुद के उपायों को कार्यान्वित करें। इसके लिए विस्तृत योजनाएं जल्द से जल्द बनाई जानी चाहिए। रक्षा मंत्रालय के सभी संगठनों को उपलब्ध फंड का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने में समान रूप से योगदान देना चाहिए।

हालांकि  रक्षा रणनीतिकार हमेशा जीडीपी के 3 प्रतिशत की मांग करते रहे हैं, लेकिन इतना आवंटन प्राप्त करना लगभग असंभव प्रतीत होता है। इसलिए  लगभग 2 प्रतिशत का अधिक यथार्थपूर्ण आवंटन एक उल्लेखनीय बदलाव साबित होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बजट के पूंजीगत हिस्से को निर्धारित करने से पूर्व पहले की खरीदों पर आधारित प्रतिबद्ध देयताओं को ध्यान में रखने की जरूरत है।

उनके पूर्ववर्तियों द्वारा उठाए गए कदमों के आधार पर  मैं देश की नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दो विनम्र सुझाव देना चाहूंगा। देश के चुनावी मोड में आने के बाद अरुण जेटली ने टीवी पर एक बातचीत में स्वीकार किया था कि रक्षा के लिए आवंटन वांछनीय स्तरों से कहीं कम थे और इसे बढ़ाया जाना चाहिए था। पिछली सरकार के सभी बजटों को पेश करने के बाद कहीं जाकर उन्हें यह ख्याल आया था। गोली चल जाने के बाद उसे रोकने की कोशिश न तो संभव है और न ही प्रशंसायोग्य। उनके बयान से राष्ट्रीय स्तर पर गुस्से में बढोतरी ही हुई क्योंकि इससे सशस्त्र बलों के प्रति उनका दुराग्रह झलकता है।

कार्यवाहक वित मंत्री के रूप में  जब अरुण जेटली उपचार के लिए बाहर गए थे, पीयूष गोयल ने रक्षा बजट के पहली बार 300,000 करोड़ रुपये के पार जाने के आंकड़े पेश किए थे लेकिन उन्होंने जीडीपी के प्रतिशत हिस्से का खुलासा नहीं किया था। वास्तव में उनके बजट में प्रतिशत आवंटन (1.4 प्रतिशत) 1962 के बाद से सबसे कम था। उन्होंने आंकड़े देकर एक सकारात्मक छवि बनाने की उम्मीद की थी, लेकिन सच कहा जाए तो उनके कदम से कोई भी प्रभावित नहीं हुआ।

रक्षा समुदाय के भीतर ऐसी उम्मीद है कि निर्मला सीतारमण बजट तैयार करने में एक सुविचारित दृष्टिकोण अपनाएंगी और सशस्त्र बल विरोधी पूर्वाग्रह नहीं रखेंगी जैसा उनके पूर्ववर्तियों ने किया। हो सकता है कि  एक वित मंत्री के रूप में वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार न हों लेकिन उन लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति होगी जो इसके लिए जिम्मेदार हैं लेकिन फंड की कमी के कारण बाधित हैं।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

Comments

Most Popular

To Top