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सेना को घटिया गोला-बारूद क्यों ?

अल्ट्रालाइट हॉवित्जर तोप
फाइल फोटो

केंद्र सरकार को भारत की तीनों सेनाओं के हर पहलू पर बेहद गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत इसलिए है कि सेनाएं आज नई चुनौतियों के बीच अपने कर्तव्य का पालन कर रही हैं। एक ओर सीमा पार दुश्मन से पूरा मुकाबला करने के लिए वह सरहद के बेहद निकट अपना आधार बनाने जा रही हैं वहीं दूसरी ओर सेना को बेहद घटिया गोला-बारूद की आपूर्ति की जा रही है। एक मायने में यह सेना के साथ विसंगति है। ऐसा होना देश की बाहरी और आतंरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। सेना ने रक्षा मंत्रालय को विस्तार से एक पत्र लिखकर शिकायत की है कि केंद्र सरकार के ही स्वामित वाले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड द्वारा उसे बेहद घटिया किस्म के गोला-बारूद की आपूर्ति की जा रही है। इसकी वजह से युद्धक टैंकों से लेकर तोपों और एयर गनों से होने वाले हादसों की संख्या बढ़ी है। पत्र में इस बात का उल्लेख चिंताजनक है कि इससे कई बार सेना के अफसर घायल हुए हैं और कई बार जवानों की भी मौत हो जाती है।





यह अच्छी बात है कि रक्षा मंत्रालय ने इस पत्र में दर्ज शिकायतों पर संज्ञान लिया है। पर सोचना होगा कि सेना ने इस बाबत शिकायत की ही क्यों? क्या गुणवत्तायुक्त गोला-बारूद की आपूर्ति की जिम्मेदारी ऑर्डनेंस बोर्ड की नहीं थी?  क्यों उसने बीते दिनों में मानकों आधार पर सामग्री की आपूर्ति सेना को नहीं की? बोर्ड को इस बात के लिए जवाबदेह ठहराना होगा और जरूरत पड़े तो संबंधित कर्मियों पर सीधे कार्रवाई भी करनी होगी। सेनाएं पूरे जोश, जज्बा व जुनून के साथ सरहद की रखवाली से लेकर देश के भीतर की चुनौतियों का सामना करती हैं। जब कार्रवाई या ऑपरेशन के दौरान उनका सामना घटिया किस्म के औजारों से होता है तो जवानों का भरोसा इन हथियारों से उठ जाता है। लेकिन जब भरोसेमंद हथियार उनके साथ होते हैं तो जवानों का मनोबल और बढ़ जाता है। सेना के दोयम दर्जे के गोला-बारूद की आपूर्ति भला किस काम की।

ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने रक्षा मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति की उस रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया जिसमें समिति ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि सेना के तमाम औजार संग्रहालय में रखने के काबिल हैं। भारी भरकम रक्षा बजट के बावजूद सेना को गोला-बारूद की आपूर्ति नहीं हो पा रही है यह बात समझ से परे है। समझ से परे इसलिए है कि आखिर रक्षा जैसे  अति महत्वपूर्ण मसलों पर जिम्मेदार पदों पर बैठे नीति-नियंता तथा निगरानी करने वाले अधिकारी आखिर कर क्या रहें हैं।

 

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