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जवानों के लिए स्मार्ट वर्दी क्यों नहीं बना पा रही ऑर्डनैंस फैक्टरियां

टेक्सटाइल ओर्डनेंस फैक्टरी

हाल ही में एक समाचार पत्र में एक रिपोर्ट छपी, जिसमें यह कहा गया कि सेना ने ऑर्डनैंस फैक्टरियों से अपनी खरीद में 50 प्रतिशत की कटौती करने और उस फंड का इस्तेमाल हथियार तथा अन्य अनिवार्य वस्तुओं की खरीद में करने का फैसला किया है। इस रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत हुआ कि सैनिकों को अपनी वर्दी खरीदने के लिए अपने खुद के फंड की आवश्यकता होगी क्योंकि उन्हें अब सेना के फंड के तहत इसे उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।





इस रिपोर्ट ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सरकार पर यह आरोप लगाने का अवसर दे दिया कि सरकार सैनिकों को जरूरी फंड उपलब्ध करने में विफल साबित हो रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘मेक इन इंडिया (खोखले नारे और निरर्थक शब्द) के नारे लगाए जाते हैं जबकि हमारे जवानों को खुद अपने जूते एवं कपड़े खरीदने पड़ते हैं। ‘ दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, ‘ मि. मोदी, आपको शर्म आनी चाहिए। आपके पास दुनिया भर में घूमने-फिरने के लिए पर्याप्त पैसा है लेकिन सेना के जवानों के लिए वर्दियां खरीदने के लिए फंड की किल्लत है।‘ पर हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है।

कई दशक से सेना को भारत सरकार के एक उपक्रम ऑर्डनैंस फैक्टरियों से निर्मित्त वर्दियां उपलब्ध कराई जाती रही हैं। खराब फिटिंग और निम्न गुणवत्ता के अलावा ऐसा कई बार देखने में आया जब शर्ट और ट्राउजर के रंग अलग-अलग थे, जिस वजह से वे उपयोग के लायक नहीं थे। जवान हमेशा स्मार्ट वर्दी चाहते हैं जिसकी वजह से उन्हें खुद शहरों की दुकानों से वर्दी खरीदने को मजबूर होना पड़ा।

इस प्रकार सशस्त्र बलों के सुझावों के आधार पर सातवें वेतन आयोग ने वर्दियों की आपूर्ति के लिए नियमों में बदलाव कर दिया। आयोग की अनुशंसाओं और सरकार द्वारा दी गई स्वीकृति के अनुसार, वर्दियां और ड्रेस तथा इसके रखरखाव से संबंधित विभिन्न प्रकार के भत्ते उपलब्ध कराए जाने की प्रणाली को एक समेकित ‘ ड्रेस भत्ता‘ में विलय कर दिया गया।

इसके तहत एक जवान को सालाना 10,000 रुपये दिए जाते हैं जो उसके खाते में डाल दिए जाते हैं। जब भी महंगाई भत्ते में 50 प्रतिशत की वृद्धि होती है, इसमें 25 प्रतिशत की बढोतरी होगी।

ऑर्डनैंस फैक्टरियों की स्थापना कई दशक पहले हुई थी जब देश का तकनीकी और औद्योगिक आधार निम्न था। बढ़ती अर्थव्यवस्था एवं औद्योगिक आधार के साथ उन चीजों के लिए ऑर्डनैंस फैक्टरियों पर निर्भरता, जो खुले बाजार में आसानी से उपलब्ध है और जिनकी कीमत तुलनात्मक रूप से कम है, बहुमूल्य बजटीय आवंटनों को बर्बाद करना है। पिछले कुछ वर्षों से सरकारों ने महसूस किया कि ऑर्डनैंस फैक्टरियां सफेद हाथी की माफिक हैं लेकिन यूनियनों के राजनीतिक दबाव के खौफ से उन्होंने उन्हें बंद करने से इंकार किया। इसलिए उनका वजूद बना रहा और वे निम्न गुणवत्ता वाले उपकरणों का निर्माण करती रहीं। किसी को यह पसंद नहीं था लेकिन सरकार इसे स्वीकार करने को विवश थी क्योंकि इसके अलावा कहीं कोई विकल्प भी नहीं था।

उनसे दूरी बनाने के फैसले ने ऑर्डनैंस फैक्टरी यूनियनों को पहले ही नाराज कर दिया है। उन्होंने अदालत जाने की धमकी दी है क्योंकि उनका बकाया ऑर्डर अभी भी बचा हुआ है। उन्हें डर है कि सरकार ऑर्डनैंस फैक्टरियों को बंद कर देगी या इससे भी बुरा यह हो सकता है कि इसे निजी वेंडरों के हाथों बेच दे। अधिकांश ऑर्डनैंस फैक्टरियां अपनी उपयोगिता खो चुकी हैं, निम्न प्रौद्योगिकी और गुणवत्ता में फंसी हुई हैं। पिछले वर्ष जुलाई में सेना के वाइस चीफ जनरल सरथ चंद ने कहा था कि ये ऑर्डनैंस फैक्टरियां नई प्रौद्योगिकी के साथ तालमेल नहीं बना पाई क्योंकि उनकी कभी किसी से कोई प्रतिस्पर्धा रही ही नहीं।

रक्षा मंत्रालय ने इस वर्ष जनवरी में घोषणा की थी कि वह ऑर्डनैंस फैक्टरियों में अब वह कोई भी निवेश नहीं करेगा। उसने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि उसे संसद में नियमित रूप से उनके उत्पादों की निम्न गुणवत्ता को लेकर सवालों का जवाब देना पड़ता था। ऑर्डनैंस फैक्टरियों के कामकाज के मूल्यांकन के आधार पर सरकार ने पिछले वर्ष अगस्त में ऑर्डनैंस फैक्टरियों के 13 वरिष्ठ अधिकारियों को बर्खास्त करने जैसा अत्यंत कठोर कदम उठाया था।

यहां तक कि पिछले वर्ष की सीएजी रिपोर्ट ने भी ऑर्डनैंस फैक्टरियों पर महत्वपूर्ण वस्तुओं की देर से डिलीवरी करने तथा उनमें निम्न गुणवत्ता का आरोप लगाया था। वर्ष 2015 की सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया था- ‘ 10 ऑर्डनैंस फैक्टरियों की हमारी ऑडिट ने वाउचरों को अग्रिम रूप से जारी किए जाने के रूप में अतिश्योक्तिपूर्ण विवरण का एक सतत रुझान प्रदर्शित किया। बिना वास्तविक रूप से जारी किए हुए ऑर्डनैंस फैक्टरियां मांग भुगतान के लिए इन्हें प्रस्तुत करती हैं।‘

समग्र परिप्रेक्ष्य में, ऑर्डनैंस फैक्टरियों पर निर्भर रहने के बजाए सैनिकों को उनकी अपनी वर्दी खरीदने के लिए सरकार द्वारा धन मंजूर करने का लिया गया फैसला एक स्वागत योग्य निर्णय है और यह वित्तीय बोझ नहीं बल्कि लाभदायक फैसला साबित होगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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