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कैदियों की बदहाली पर सरकारों का ध्यान क्यों नहीं ?

रोहिणी जेल
प्रतीकात्मक फोटो

एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ के जेल प्रशासन का यह प्रयास देश की अन्य जेलों के लिए प्रेरणादायी है। जिसमें तिहाड़ जेल प्रशासन ने गत एक वर्ष में सात हजार से ज्यादा कैदियों की काउंसलिंग की और उसके अच्छे परिणाम आए। जेल प्रशासन की यह बात भी राहत देने वाली है कि काउंसलिंग से कैदियों में आपराधिक प्रवृति और आत्महत्या करने के संभावित प्रयासों में 50 फीसदी की गिरावट देखी गई। एम्स के मनोचिकित्सक विभाग के प्रोफेसर के दिशा निर्देश में एक एनडीओ द्वारा किया गया यह सकारात्मक प्रयास देश के अन्य जेलों को भी करना चाहिए ताकि आए दिन आत्महत्या करने वाले कैदी अपना रास्ता बदल सकें। पूरे देश में जेलों में बंद कैदियों को कदम-कदम पर न जाने किन-किन परेशानी भरी स्थिति-परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के तमाम दिशा-निर्देशों के बाद भी जेलें बदहाली और बदइंतजामी का शिकार हैं। सुप्रीम कोर्ट की बार-बार सख्त टिप्पणियां केंद्र व राज्य सरकारों को बेहतरी की ओर कदम उठाने के लिए क्यों आगे नहीं कर पा रही, समझ से परे हैं।





दरअसल पूरे देश की जेलों में बंद कैदियों की मानसिक सेहत पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। इस बात से सभी जेल प्रशासन व सरकारें परिचित हैं। देश की सर्वोच्च अदालत यहां तक कह चुकी है कि जेल प्रशासन तक से जुड़े अधिकारियों की नजर में कैदी इन्सान हैं भी कि नहीं? जेल परिसर में बंद कैदियों द्वारा मारपीट, हिंसा, हत्या, आत्महत्या और गैंगवार आदि से जुड़ी घटनाएं अखबार की सुर्खियां इसलिए बनती हैं कि उनका मन शांत, सचेत व एकाग्र नहीं है। ऐसे में उन्हें लगातार तथा स्तरीय काउंसलिंग की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट अपने 11 सूत्रीय निर्देश में सरकारों को स्पष्ट कह चुका है जिसमें कैदियों की स्वतंत्रता के अधिकार, जेलों में अप्रकृतिक मृत्यु वाले बंदियों के परिवारों को मुआवजा देने, एकाकीपन व कैद से निपटने के लिए काउंसलिंग पर विचार करने की बात कहीं गई है। सरकारों से पूछा जाना चाहिए कि इन दिशा-निर्देशों के बाद उन्होंने क्या कदम उठाए?  क्यों अभी देश की जेलों में अस्वाभाविक मौतें हो रही हैं? इन मुद्दों पर सरकारों को अपने गिरेबां में झांकने तथा संवेदनशाल बनने की जरूरत है।

हमें इस बात को समझना होगा कि आखिर कैदी भी इन्सान हैं, जीते जागते मानव हैं। यह सही है कि किसी अपराध की सजा में वे वहां पर बंद हैं। वे किन मनोस्थतियों में जेल की सलाकों के पीछे कैद हैं और वे किस तरह दबाव, खिंचाव और तनाव में आकर अपने जीवन से छुटकारा पाने के लिए सोच रहे हैं। इस पर सोचने और तत्काल कदम उठाने की जरूरत सरकारों को हैं। आंकड़ें बताते हैं कि साल 2015 में रोजाना औसतन चार कैदियों की मौत हुई। कुल 1,584 बंदियों की जेल में मौत हुई जिनमें 1,469 स्वाभाविक थीं बाकी अस्वाभाविक। आंकड़ें ये भी बताते हैं कि अस्वाभाविक मौंतों में दो तिहाई यानी 77 आत्महत्या के मामले थे जबकि 11 की हत्या साथी कैदियों द्वारा की गई। क्या यह आंकड़ें यह साबित नहीं करते कि देश के जेलों के अधिकारियों और जिम्मेदार मंत्रियों ने इस ओर गंभीर और सही कदम नहीं उठाए।

इस ओर संवेदनशील होकर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। सरकारों को ऐसे कदम उठाने होंगे कि करागार में बंद जीवित कैदी का जीवन (मन व शरीर के साथ) कैसे बेहतर बनाया जाए ताकि वह जेल के भीतर और बाहर समाज में आकर शांति से रह सके। देश की कई जेलों में योग-प्रणायाम, आसन, ध्यान, संगीत तथा अन्य गतिविधियां सक्रिय रूप से की जा रही हैं। अहमदाबाद, जयपुर, यरवदा, तिहाड़ की सेंट्रल जेलों में विपश्ना ध्यान से कैदियों की जिंदगी ही बदल गई है। काउंसलिंग एक प्रभावी कदम है जैसा कि तिहाड़ जेल के प्रयासों से आए आंकड़ें खुद बताते हैं। हमें याद रखना होगा कि कैदियों को करागार में स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण वातावरण देकर ही हम उन्हें बेहतर नागरिक बना सकते हैं।

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