vishesh

चुनावी बहसों में क्यों न हो राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा ?

भारतीय सेना
फाइल फोटो

रक्षा और सशस्त्र बलों को लेकर राजनीतिक दलों के विचारों में बहुत बड़ा अंतर है। कांग्रेस ने दावा किया कि जब वह केंद्र में थी तो उसने भी पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की थी लेकिन उसने कभी भी इसे प्रचारित नहीं किया। दूसरी तरफ  बीजेपी खुद की छवि एक ऐसी एकमात्र पार्टी के रूप में उभारना चाहती है जो आतंकी समूहों को पाक के समर्थन का मुंहतोड़ जवाब दे सकती है। बीजेपी कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाती है कि उसने OROP को मंजूरी नहीं दी। जबकि बीजेपी ने इसकी मंजूरी दी (भले ही यह एक बार ही क्यों न हो)। बीजेपी ने कांग्रेस पर रक्षा तैयारियों की भी अनदेखी करने का आरोप लगाया। प्रत्येक मामले में  राजनीतिक दल सच्चाई से दूर ही भागते नजर आए हैं।





बीजेपी ने खुद को ऐसी इकलौती पार्टी के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की जिसने आतंकी कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के खिलाफ स्ट्राइक की। चुनाव आयोग द्वारा सख्त रवैया अख्तियार करने से पहले ही इसने पाकिस्तान द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन और पुलवामा के शहीदों के साथ अपने चित्रों का पोस्टर भी लगा दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने निजी लाभ के लिए सशस्त्र बलों का राजनीतिकरण करने की कोशिश की है और साथ ही  विशाल सैन्य समुदाय के वोट बैंक को हासिल करने का भी प्रयास किया है।

दोनों राष्ट्रीय पार्टियां एक दूसरे पर रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाती रही हैं। इस प्रकार  वास्तविक रूप से कहा जाए तो जिन मुद्वों पर चर्चा की जा रही है, वे हास्यास्पद हैं। राजनीतिक लाभ के लिए सशस्त्र बलों का शोषण किया जा रहा है और आधी अधूरी योजनाओं का गुणगान कर उन्हें अपनी उपलब्ध्यिों के रूप में गिनाया जा रहा है। दूसरी तरफ पार्टियों ने हाल ही में कई अवसरों पर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित पहलुओं पर उनकी टिप्पणियों के लिए सेना प्रमुखों की आलोचना की है। खुशकिस्मती से चुनावों के नजदीक आने के कारण अब यह मुद्दा पीछे छूट गया है।

सबसे हालिया वाकया वायु सेना प्रमुख द्वारा चिनूक हेलिकॉप्टर को शामिल किए जाने के दौरान दिया गया बयान था। जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारतीय वायु सेना की इनवेंटरी में राफेल रहा होता तो पाकिस्तान के विमान नियंत्रण रेखा को लांघने की जुर्रत नहीं करते। कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने इस बयान पर आपत्ति की और कहा कि यह चुनावी समय में दिया गया राजनीतिक बयान है और इसके भारत की सुरक्षा क्षमताओं से संबंधित निहितार्थ हैं।

इसके विपरीत जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं। राजनीतिक दल ऐसे ऐसे वादे कर रहे हैं जिसे वे जीवन में कभी भी पूरे नहीं कर सकते। ऐसे ऐसे वादे किए जा रहे हैं जिन्हें पूरा करना किसी भी राष्ट्रीय बजट के बूते की बात नहीं है और ये हकीकत से कोसों दूर हैं। राजनीतिक दल भारतीय जनता को काफी नासमझ समझते हैं और मानते हैं कि वह ऐसे अस्पष्ट वादों और भाषणों पर भरोसा कर लेगी।

किसी भी चुनाव में आज तक कोई भी चर्चा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नहीं हुई है जो हमेशा केंद्र में आसीन किसी भी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में बनी रहेगी। किसी भी देश का विकास उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर निर्भर करता है। किसी असुरक्षित देश में कभी कोई निवेश नहीं हो सकता और टेक्नोलॉजी विकसित नहीं हो सकती। पाकिस्तान इसका ज्वलंत उदाहरण है। भारत का विकास इसीलिए हुआ है क्योंकि यह देश और इसके संस्थान सुरक्षित रहे हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा में निहित है- संभावित खतरों का अनुमान लगाना, विरोधियों के साथ संबंध या तो स्वदेशी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के जरिये या फिर आयात सुनिश्चित करने के लिए फंडों को मंजूरी देने के द्वारा सशस्त्र बलों की क्षमताओं का विकास। इसमें सशस्त्र बलों को समेकित करने तथा रक्षा मंत्रालय तथा सेना मुख्यालयों में एकीकरण सहित रक्षा का प्रबंधन एवं प्रशासन भी शामिल है।

हालांकि भारत में विचारों की तुलना के लिए राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच एक ही मंच पर वाद विवाद की प्रणाली नहीं रही है, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं के द्वारा विभिन्न मीडिया नेटवर्कों पर इस पर चर्चा की जा सकती है और वे अपना संबंधित राजनीतिक दृष्टिकोण जाहिर कर सकते हैं। ऐसी बहसों में श्रोताओं को भी प्रश्न पूछने एवं अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करने की अनुमति होनी चाहिए। सवाल पूछे जाने से पहले पार्टियों के बीच उनका आरंभिक विचार जानने के लिए अग्रिम रूप से ही विषयों को साझा किया जा सकता है।

ऐसी उम्मीद की जाती है कि केवल स्वीकार्यता चाहने के लिए राजनीतिक दल ऐसे समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं जो वास्तविकता की सीमा से परे हों, पर सजग श्रोता उनकी ऐसी कोशिशों को विफल कर सकते हैं। यह ऐसे मुद्वों पर पार्टियों की जागरूकता के स्तर का भी संकेत देगी।

बड़ी टीआरपी के साथ ऐसे कई चैनल हैं जो खुले दर्शकों के साथ इस प्रकार की बहस की शुरुआत करने की पहल कर सकते हैं। इससे कम से कम राजनीतिक दलों द्वारा इस तरह के गलत दावे और वादे करने पर रोक लगेगी और वे अपना दृष्टिकोण अधिक वास्तविक बना पाएंगे। भारतीय चुनाव केवल आंतरिक मुद्वों, भ्रामक वादों और आरोप-प्रत्यारोप पर ही आधारित नहीं होना चाहिए बल्कि इसमें अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, गठबंधनों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सही मिश्रण होना चाहिए क्योंकि ये ही देश के भविष्य को सही दिशा दे सकते हैं। ऐसी उम्मीद की जाती है कि कुछ मीडिया घराने इस बाबत पहल करेंगे और ऐसी बहस-मुबाहिसा शुरू करेंगे। भविष्य के लिए यह एक गेम चेंजर साबित हो सकता है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

Comments

Most Popular

To Top