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जेलों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं ?

जेल में कैदी
जेल में कैदी (सौजन्य- गूगल)

देश की हाईप्रोफाइल तिहाड़ जेल की यह खबर इस बात का खुलासा करती है कि बीते दिनों जेल में हुई कई अनियमितताओं के बावजूद वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए। कभी वहां नॉन वेज पार्टी होने की बात सामने आई तो कभी जेल कैदियों के साथ कर्मचारियों की मारपीट की बात। इन घटनाओं के बाद दिल्ली हाईकोर्ट को आदेश देना पड़ा कि कर्मचारियों और कैदियों के साथ मारपीट की घटना की जांच सीबीआई करेगी। क्या यह उचित है कि ऐसी घटनाएं घटें और उस पर जमीनी स्तर पर काम न हो तथा ऐसी ही मिली-जुली घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहे और जेल प्रशासन निष्क्रिय बना रहे?





अभी एक पखवाड़े पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में ठूंसकर भरे हुए कैदियों के बारे में टिप्पणी की थी और कहा था कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इस बाबत उसने देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया था कि वे इस मामले को स्वतः रिट याचिका के तौर पर लें। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार जेलों की बदहाली और बदइंतजामी पर टिप्पणी कर चुका है तथा दिशा-निर्देश दे चुका है। पर दिक्कत यह है कि कुछ समय तक कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन होता है और बाद में राज्य सरकारें, जिम्मेदार अफसर तथा जवाबदेह जिला प्रशासन देश की जेलों की दशा-दुर्दशा के प्रति असंवेदनशील हो जाता है और हालात बेहद खराब हो जाते हैं।

हकीकत तो आज यह है कि न जेल की दीवारे और चारदीवारी सुरक्षित है औऱ न ही कैदी। पूरे देश में कहीं न कहीं कैदियों के भाग जाने, सुरंग बनाने, दीवारें तोड़ने, कैदियों के परस्पर मारपीट करने, आत्महत्या करने, सुरक्षाकर्मियों व कैदियों में भिड़ंत के समाचार अखबार की सुर्खियां बनते रहते हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि जेलों में अव्यवस्था है। अलावा इसके आजादी के इतने वर्ष बीत जाने, केन्द्र व राज्यों में नई सरकारों के आ जाने और देश की सबसे बड़ी कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद भी स्थितियों का कमोबेश ज्यों का त्यों होना यह दर्शाता है कि हम सुधार की ओर तेजी से कदम नहीं बढ़ाना चाहते। संविधान की सातवीं अनुसूची के मुताबिक जेलों का प्रबंधन व रख-रखाव पूरी तरह राज्य सरकारों का विषय है। पर दुर्भाग्य यह है कि जेलों में रसूख व पैसे वाले कैदियों की चलती है। उन्हें कैद के दौरान तमाम सुविधाएं मिलती रहती हैं। ‘दादागिरी’ रहती है। और यह सब होता है जेल के कर्मचारियों-अधिकारियों की मिलीभगत और अनदेखी से। ताजा उदाहरण है तिहाड़ एक नंबर जेल में हुई नॉन वेज पार्टी की। जिसमें नियमों को ताक पर रखकर ऐसा किया गया। इसी तरह कुछ हफ्ते पहले इसी जेल में सुरक्षाकर्मियों द्वारा कैदियों के साथ मारपीट का मामला सामने आया था जिसकी जांच दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई को सौंपी है। क्या देश की नामी-गिरामी और आतंकवादी से लेकर हाई प्रोफाइल कैदियों को रखने वाली इस जेल में सुरक्षा इंतजामों की खुलेआम पोल नहीं खोल रहीं?

दरअसल दुर्भाग्य यह है कि जेलों की सुरक्षा और व्यवस्था में लगा पूरा तंत्र पूरे मन और ऊर्जा के साथ जेल की अव्यवस्थाओं, अनियमितताओं के प्रति कर्मठ नहीं होना चाहता। जरूरत है एक सतत् निगरानी तंत्र की। जो बनानी और विकसित करनी होगी। सिर्फ यह रोने से काम नहीं चलने वाला कि फलां जेल में सीसीटीवी कम हैं या अमुक जेल में कर्मचारियों की संख्या कम है। पूरे देश की तमाम जेलों में चलाए जा रहे सुधार कार्यक्रमों के बावजूद कैदियों की हत्या तथा आत्महत्या की घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि वहां चाक-चौबंद सुरक्षा के इंतजाम की जरूरत है।

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