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क्यों ज़रूरी है सेना का ख़ौफ़?

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

किसी भी सभ्य समाज का आख़िरी विकल्प सेना ही होती है। फिर चाहे वो लोकतंत्र हो या अन्य राजनीतिक व्यवस्था। सेना का अन्तिम लक्ष्य शान्ति हासिल करना है। लेकिन इसके लिए उसे हिंसा और विध्वंस का सहारा लेना पड़ता है। अशान्त क्षेत्र में सेना की तैनाती ये बताती है कि वहाँ अन्य सभी नागरिक संस्थाएँ ‘अक्षम और बेमानी’ साबित हो चुकी हैं। इसीलिए थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के उस बयान का मतलब ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है कि ‘उस देश का बुरा हाल होता है, जहाँ लोग सेना से डरना छोड़ देते हैं।’





इस बयान का प्रसंग है कि जम्मू-कश्मीर में 9 अप्रैल को श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव के दौरान सेना के वाहन पर एक व्यक्ति को बाँधकर ले जाने का मेज़र नितिन लीतुल गोगोई का फ़ैसला। उन्होंने पत्थरबाज़ों की हिंसा से बचने के लिए और दर्जनों अन्य लोगों की हिफ़ाजत के लिए एक मासूम कश्मीरी को मानव ढाल क्यों बनाया? फिर सेना ने इस क़दम के लिए उन्हें सम्मानित क्यों किया? सेना प्रमुख ने इसे विशेष परिस्थितियों में लिया गया विशेष फ़ैसला क्यों बताया? ऐसे हरेक प्रश्न के कई जवाब हो सकते हैं। इसीलिए सामने भी आये हैं। ये स्वाभाविक भी है।

इसी प्रसंग में ये समझना भी ज़रूरी है कि भारत की नहीं, सारी दुनिया की सेनाएँ किन सिद्धान्तों से संचालित होती हैं? और, सभ्य समाज में सेना का ख़ौफ़ क्यों ज़रूरी है? यदि हम इसे समझ पाएँ तो निश्चित रूप से इस प्रसंग की बेहतर समीक्षा कर पाएँगे। बुनियादी बात ये है कि सेनाध्यक्ष का प्रत्यक्ष दायित्व हमारी रक्षा करना नहीं है। बल्कि उन्हें देश की सीमाओं को सुरक्षित और अक्षुण्ण बनाये रखने का दायित्व दिया गया है। सेना, हमारी परोक्ष रूप से रक्षा करने के लिए कटिबद्ध होती है। प्रत्यक्ष रक्षा का काम पुलिस का है। फिर चाहे बात क़ानून-व्यवस्था की हो या प्राकृतिक आपदा की!

चूँकि, अलग-अलग दशाओं में पुलिस अपने दायित्व को निभाने में अक्षम रहती है, इसीलिए सेना की मदद लेनी पड़ती है। सेना की सबसे बड़ी विशेषता ये होती है कि युद्ध हो या शान्तिकाल, वो अपने काम को पूर्णतः आत्मनिर्भरता से करती है। पूरे स्वावलम्बन के साथ, पूरी तरह के अपने अधीन साधन और सुविधाओं पर निर्भर रहकर। किसी भी अन्य नागरिक संस्थाओं के सहयोग के बग़ैर अपना अभीष्ट हासिल करना किसी भी सेना का सर्वोच्च गुण होता है। इसलिए सेना से ये अपेक्षा रखना भी उचित नहीं होगा कि जब वो पुलिस का काम कर रही हो, तब उसकी जवाबदेही भी पुलिस जैसी हो, जो सर्वथा अव्यावहारिक, ग़ैरक़ानूनी और नामुमकिन है!

सेना का काम विनिर्माण (Reconstruction) नहीं है। वो तो सिर्फ़ पूर्ण विनाश (Total Loss) से बचाव का आख़िरी तरीक़ा है। इसमें वो सफल रहे या विफल! उसे सफल बनाने के लिए ही ये अभिकल्पना है कि सभ्य समाज को सेना की आलोचना नहीं करनी चाहिए, उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए, उसके विवेक की समीक्षा नहीं की जानी चाहिए, उसे हुई क्षति का मलाल भी वतन को ज़ाहिर नहीं करना चाहिए। इसीलिए लोकतंत्र ही नहीं, हरेक शासन प्रणाली में सेना का सिर्फ़ शौर्य गान ही होना चाहिए। बीते 70 साल में भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और विसंगतिपूर्ण देश में राजनीतिक एकता को पैदा करने, उसे क़ायम रखने और तमाम पतन के बावजूद अपने अराजनीतिक (Apolitical) स्वरूप को बनाये रखने में भारतीय सेनाओं का स्थान अद्वितीय है!

अपने तमाम निहित स्वार्थों या अज्ञानतावश देश के असंख्य लोगों को लगता है कि सेनाध्यक्ष भी दक्षिणपन्थियों की कठपुतली बन गये हैं। मुमकिन है, इसमें कुछ सच्चाई भी हो। लेकिन उनके इस बयान में कोई खोट नहीं है कि ‘उस देश का बुरा हाल होता है, जहाँ लोग सेना से डरना छोड़ देते हैं।’ इसे सिर्फ़ कश्मीर या किसी अन्य उपद्रवग्रस्त तथा अशान्त क्षेत्र से ही जोड़कर मत देखिए। याद कीजिए कि फरवरी 2016 में हरियाणा में जाट आरक्षण की माँग कर रहे लोगों ने कैसा उत्पात मचाया था। तब शायद, पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ‘ग़ैर-अशान्त क्षेत्र’ में सेना को बुलाये जाने के बावजूद हालात बेकाबू ही बने रहे।

क्यों हरियाणा की हिंसा के सामने सैन्य बल भोथरा साबित हुआ? सिर्फ़ इसीलिए कि लोगों में सेना का डर नहीं था। डर इसलिए नहीं था कि सेना तो थी लेकिन उसका व्यवहार सेना जैसा नहीं था, क्योंकि उसे पूरी छूट नहीं मिली थी। इसीलिए सेना की मौजूदगी के बावजूद हिंसा क़ाबू में नहीं आयी। वो सेना के मनोबल के लिए महाघातक दशा थी! किसी भी सेना को सिर्फ़ इंसान को मारने के लिए बनाया जाता है। फिर वो इन्सान चाहे दुश्मन की शक्ल में हो या निहत्थे और मासूम नागरिकों के रूप में। इसके लिए सेना को बहुत सख़्त मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण और परिवेश से गुज़रना होता है। अनुशासन और अफ़सर के हुक़्म की हर क़ीमत पर तामील करने का संस्कार पैदा करना बहुत मुश्किल काम है। लेकिन सेनाएँ इसे हासिल करती हैं।

सेना को बहुत दुर्गम और दुर्दान्त परिस्थितियों से जूझने के लिए तैयार किया जाता है। उसे किसी भी भौगोलिक परिस्थिति में न्यूनतम सुविधाओं के साथ सफलता हासिल करनी होती है। वो संसाधन की कमी का रोना रोकर पलायन नहीं कर सकती। वो माकूल वक़्त का हवाला देकर अपने कर्तव्य को टाल नहीं सकती। सैनिक भी इन्सान होते हैं। लेकिन उन्हें इन्सानों का क़ातिल बनने के लिए तैयार किया जाता है। उसे उपयुक्त वक़्त पर दया, करुणा जैसे सामान्य मानवीय गुणों से विमुख रखना मामूली काम नहीं है। हर सैनिकों को आपनी कार्रवाई के वक़्त उसी मनोदशा से गुज़रता पड़ता है, जो महाभारत की लड़ाई के वक़्त अर्जुन की थी और जिससे उबरने के लिए कृष्ण को उन्हें गीता का उपदेश देना पड़ा था।

सैनिक में भी उन्माद का होना ज़रूरी है। वर्ना, वो प्राणोत्सर्ग के लिए प्रेरित नहीं हो सकता। सैनिक का उन्माद अपने वतन की हिफ़ाजत के लिए होता है। इसीलिए सैनिकों में अन्य नागरिकों की अपेक्षा Superiority Complex (श्रेष्ठता का भाव) पैदा किया जाता है। उसे उन्मुक्त और उदार नागरिकों (Civilians) से यथासम्भव दूर रखा जाता है। सैनिक स्थानीय लोगों से, एक सीमा से अधिक, घुलमिल न सके इसीलिए उसका जल्दी-जल्दी तबादला करके स्थान को लगातार बदला जाता है। सेना को भी निहत्थों पर गोलियाँ बरसाकर ऐसी ग्लानि होती है, जो उसके मनोबल के लिए उपयुक्त नहीं है। इसीलिए, सेनाध्यक्ष कह रहे हैं कि सामने से भी गोलियाँ आयें तो उनका काम आसान हो जाए।

गोलियाँ तो बाक़ायदा दुश्मन की ही होंगी। क्योंकि वो सामने वाले का जीवन लेने के लिए चलायी जाती हैं। फिर चाहे उसे चलाने वाला आतंकवादी हो, नक्सली हो या कोई अन्य अपराधी। सेना का धर्म है दुश्मन को मिटाना। अपने धर्म-पालन से ही वो गौरवान्वित महसूस करती है। इसीलिए, यदि किसी भी लाचारी की वजह से राजनीतिक सत्ता को सेना का सहारा लेना पड़ता है तो ये मत समझिए कि वो पुलिस या अन्य नागरिक संस्थाओं की भूमिका निभा सकती है। इसीलिए सैनिक शासन को अव्वल दर्ज़े का नहीं माना जाता।

जम्मू-कश्मीर में सरकार की सेना पर अतिनिर्भरता है, क्योंकि सरकार के तमाम अन्य अंग अपना काम ठीक से नहीं कर पाते हैं। तकनीकी तौर पर सेना सिर्फ़ युद्ध के लिए बनी है। सीमा की निगरानी के लिए बनी है। सीमापार से होने वाले घुसपैठ को रोकना उसकी ज़िम्मेदारी है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी का माकूल जवाब देना उसका फ़र्ज़ है। लेकिन हरेक कोशिश के बावजूद वो दस में से दस अंक नहीं हासिल कर पाती। इसकी भी बहुत सारी वजहें हैं। लेकिन जो भी कसर रह जाती है, उसका अन्ज़ाम बाक़ी प्रजा को झेलना पड़ता है। सेना एक बाँध की तरह है। वो बाढ़ से सुरक्षा तो दे सकती है, लेकिन सुरक्षा कभी भी पूर्ण और समग्र नहीं हो सकती। कभी-कभार बाँध टूटता भी है। तबाही भी होती है। अब बाँध कभी नहीं टूटे, इसके लिए कई बाँधों का जाल बिछाना ज़रूरी है। बाँधों के जाल के लिए भारी संसाधन होने चाहिए। इसके अलावा ऐसी भौगिलिक स्थितियाँ भी होनी चाहिए जहाँ बाँध बन सकें। क्योंकि चाहे जितने संसाधन हों, बाँध हरेक जगह नहीं बना सकते। नदियों को हमेशा नहर की तरह नियंत्रित नहीं रखा जा सकता।

साफ़ है कि हरेक गतिविधि की तरह-तरह की सीमाएँ तो रहेंगी ही। इसीलिए हमें जहाँ सेना की ज़रूरत होती है, वहीं पुलिस की भी अपनी ही अहमियत है। कूटनीति भी तमाम ऐसे लक्ष्य हासिल करती है जो सेना के दायरे से बाहर है। सब मिलाजुलाकर ही सरकार और सत्ता तंत्र बनता है। मानवाधिकार का दायरा भी इन्हीं सरकारों की देन है। सारी दुनिया में सेनाओं को मानवाधिकार से बाहर जाकर काम करना पड़ता है। इसीलिए व्यावहारिक तौर पर सेना का मानवाधिकारों से कोई लेना देना नहीं होता। उसे तो सिर्फ़ उन लोगों के मानवाधिकारों का संरक्षक बनना पड़ता है, जो प्रत्यक्ष रूप से लड़ नहीं रहे होते, लेकिन उन पर अशान्ति की तगड़ी मार पड़ रही होती है। इसीलिए सेना की तैनाती को हमेशा ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ साबित किया जा सकता है। मानवाधिकार के जंजाल से सेना को बचाने के लिए जहाँ ‘आत्मरक्षा के लिए दुश्मन की हत्या करने’ जैसे दर्शन (Philosophy) से संचालित किया जाता है, वहीं Arms Forces Special Area Act (AFSAA) की बदौलत उसे यथासम्भव अभय-दान भी दिया जाता है। सेना को अनुशासित रखने, उसे सिर्फ़ ख़ुद के प्रति जवाबदेह बनाने और सामान्य नागरिक दख़ल से दूर रखने के लिए कोर्ट मार्शल (सैन्य अदालत) का तंत्र भी होता है! सेना के शरीर विज्ञान (Anatomy) से जुड़े तथ्य ऐसे ही हैं। सेना से आप वो अपेक्षाएँ कभी नहीं रख सकते, जो अन्य नागरिक और राजनीतिक संस्थाओं का दायित्व है।

सेना से जुड़े उपरोक्त सैद्धान्तिक पहलुओं की आड़ में कुछेक व्यावहारिक तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता। मौजूदा माहौल में जिस तरह से सैन्यवाद में राष्ट्रवाद का घालमेल किया जा रहा है, वो भी कोई कम ख़तरनाक नहीं है। सेना के नाकाम रहने का मतलब है, सारी राजनीतिक व्यवस्था का विफल साबित होना। जिस तरह गोबर पर चाँदी का वर्क लगाकर उसे मिठाई नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह से राजनीतिक विफलता को भी राष्ट्रवादी उन्माद से नहीं ढका जा सकता। बन्दूक को प्यार बाँटने लायक कभी नहीं बनाया जा सकता, चाहे वो किसी के भी हाथ में क्यों ने हो! दुनिया की किसी भी सेना के सन्दर्भ में ये न कभी सही नहीं रहा है, न हो सकता है और न ही होना चाहिए। इसीलिए यदि एक बार को ये मान भी लें कि ‘सेना से डर’ वाला बयान बढ़िया नहीं है और सेनाध्यक्ष के शब्दों के चयन पर ज़ाहिर किये जा रहे ऐतराज में दम है, तो भी ऐसी आपत्तियों को नज़रअन्दाज़ करना ही सबके हित में है – कश्मीर के, कश्मीरियों के, कश्मीरियत के, भारत के और सेना के।

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